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पिछड़ों का एक अगड़ा गाँव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश के विभाजन के बाद शरणार्थी के तौर पर आने वाले लोगों की कामयाबी के तो कई उदाहरण मिल जाएँगे लेकिन शरणार्थियों के पूरे गाँव की प्रगति या कामयाबी की मिसाल के तौर पर उभरने के किस्से बहुत दुर्लभ हैं. लेकिन ठाकुरनगर ऐसा ही एक गाँव है. पश्चिम बंगाल के उत्तर 24-परगना जिले में बांग्लादेश की सीमा से सटे आखिरी स्टेशन बनगाँव के ठीक पहले बसे इस गांव ने शिक्षा और कड़ी मेहनत के ज़रिए प्रगति की एक अनूठी मिसाल कायम की है. देश के बँटवारे के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से यहाँ आए शरणार्थियों के सिर पर न तो छत थी और न ही दो जून की रोटी का कोई ठिकाना.
अब एक कस्बे में तब्दील होते ठाकुरनगर की 95 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े तबके के लोगों की है. लेकिन इस गांव ने जितने बड़े अफसर पैदा किए हैं उसकी दूसरे गांवों में कल्पना तक नहीं की जा सकती. इस सूची में एक दर्ज़न आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के अलावा दो पूर्व वाइस चांसलर, एफआरसीएस की डिग्री हासिल करने वाले पाँच डाक्टर, दो दर्जन इंजीनियर, कई वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और जज शामिल हैं. यह सही है कि उनको आरक्षण का भी लाभ मिला लेकिन भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग के निदेशक रह चुके गाँव के ही रंजीत विश्वास कहते हैं कि "हमने शुरू से ही शिक्षा को प्रगति का मूल मंत्र मान लिया. आरक्षण को कभी ध्यान में ही नहीं रखा. वह तो बाद में इससे प्रगति की सीढ़ियाँ तेजी से तय करने में सहायता मिली." एक ही स्कूल से दिलचस्प बात यह है कि गांव के तमाम अधिकारी स्थानीय ठाकुरनगर उच्च-माध्यमिक स्कूल से ही निकले हैं. हाल में एक सर्वेक्षण से पता चला है कि गाँव के 95 फीसदी लोग साक्षर हैं, यह भारत के ज़्यादातर राज्यों के औसत से काफ़ी ऊपर है.
गाँव की आबादी भले पिछड़ों की हो, यह गाँव किसी भी लिहाज से पिछड़ा नहीं है. साक्षरता का असर गाँव पर साफ नजर आता है. यहां घर-घर में बिजली है. इसके साथ ही आधुनिक सुख-सुविधा के तमाम साधन भी. केबल टीवी, ज्यादातर हाथों में मोबाइल और जगह-जगह टेलीफोन के बूथ. गाँव की सड़कें पक्की हैं. पीने के पानी की भी कोई दिक्कत नहीं है. गांव की पक्की इमारतों और आधुनिक दुकानों को देख कर शहर होने का भ्रम होता है. साफ़ है जो अधिकारी इन गांवों से निकले हैं वे अपनी जड़ों को नहीं भुला सके हैं. गाँव के मोहन लाल दास कहते हैं, "इस गाँव के लोगों ने गरीबी और पिछड़ेपन का अभिशाप झेला है लेकिन अपनी लगन और कड़ी मेहनत के बूते लोगों ने सिर्फ़ अपनी ही नहीं बल्कि इस गांव की किस्मत भी बदल दी है." केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) से जज के तौर पर रिटायर होने वाले सुधांशु विश्वास कहते हैं, "हमारे माता-पिता जब विभाजन के बाद यहां आए थे तो उनके पास फूटी कौड़ी तक नहीं थी. हमने बचपन को गरीबी को काफी करीब से देखा है. इसलिए हमने पढ़ाई पर ही ध्यान देने का फैसला किया. यही वजह है कि धीरे-धीरे यहां से एक के बाद एक अधिकारी निकलते रहे और गाँव का कायाकल्प होता रहा." विश्वास कहते हैं, "हमने एक जगह से उजड़ने के बाद शिक्षा के ज़रिए ही यहां अपनी पहचान बनाने और गाँव के पिछड़े लोगों की मदद करने को अपना मकसद बनाया था. इसमें हमें कामयाबी मिली." | इससे जुड़ी ख़बरें फौजियों का गाँव गहमर26 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस गाँवों में जूट से बनेंगी सड़कें27 अप्रैल, 2005 | विज्ञान गाँवों में एड्स फैलने पर चिंता30 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस सुदूर गाँव की रत्नाबेन हैं मोटर मैकेनिक03 जून, 2006 | भारत और पड़ोस दोराहे पर खड़ा एक गाँव13 जून, 2006 | भारत और पड़ोस अधिकारों की लड़ाई या राजनीति19 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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