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गाँवों में जूट से बनेंगी सड़कें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तारकोल और सीमेंट से अब तक बनती रही सड़कों को प्लास्टिक से बनाने की तकनीक तो कई देशों में विकसित हो चुकी है. लेकिन अब भारत में एक नई तकनीक की चर्चा हो रही है जूट से सड़क बनवाने की. भारत जैसे कृषि प्रधान और बड़ी ग्रामीण आबादी वाले देशों में यह तकनीक लोकप्रिय हो सकती है. भारत के ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जूट से सड़क बनाने की तकनीक का लाभ देखते हुए पाँच राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की मंज़ूरी दे दी है. इस तकनीक का विकास राष्ट्रीय जूट निर्माण विकास परिषद और केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान ने संयुक्त रूप से किया है. प्रयोग के तौर पर जूट से ग्रामीण क्षेत्रों की सड़क बनाने की मंजूरी दी गई है. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने पिछले सप्ताह जूट से सड़क बनाने की तकनीक का प्रजेंटेशन दो दौर में देखा. तकनीक से प्रभावित होकर डॉ सिंह ने असम, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में इस तकनीक से सड़क बनाने की मंज़ूरी दे दी है. इन राज्यों में वर्ष 2005-06 के दौरान 47.84 किलोमीटर सड़क जूट से बनाई जाएगी. ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से चल रही प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत इस तकनीक को शामिल किया गया है. इस पर पहले चरण में 22 करोड़ रुपए की लागत आएगी. बताया गया है कि पुरानी तकनीक से तैयार होने वाली सड़क की लागत से जूट तकनीक से सड़क निर्माण की लागत प्रत्येक किलोमीटर पर पाँच लाख रुपए कम है. तकनीक जूट से सड़क बनाने की तकनीक खड़गपुर आईआईटी के मोहम्मद अज़ीज़ और रामास्वामी ने विकसित की है. इस तकनीक की अनुशंसा इंडियन रोड कांग्रेस फॉर स्टैंडर्डाइजेशन ने पहले ही कर दी थी. हालाँकि सबसे पहले जूट टेक्सटाइल तकनीक की अवधारणा 1920 में स्कॉटलैंड में पैदा हुई, लेकिन चूंकि स्कॉटलैंड में अधिक जूट पैदा नहीं होता था. इसलिए तकनीक सड़क पर उतर नहीं सकी. 1934 में कोलकाता शहर में जूट का इस्तेमाल कुछ सड़कों पर पहली बार किया गया था. लेकिन जूट से सड़क बनाने की तकनीक पर 1980 से गंभीर अनुसंधान शुरू हुआ. लगभग 25 वर्ष में यह तकनीक तैयार हुई है. विधि जूट से सड़क बनाने की तकनीक का खुलासा करते हुए वैज्ञानिक मो अज़ीज़ कहते हैं, "यह तकनीक दलदली भूमि, बलुई मिट्टी, ज़्यादा नमी वाली मिट्टी और बाढ़ प्रभावित इलाकों में कामयाब होगी. जहाँ आमतौर पर तारकोल वाली सड़कें कामयाब नहीं हो पातीं."
सड़क बनाने के लिए जूट की लगभग आधा इंच मोटाई की लंबी-लंबी जमावट फैक्ट्री में की तैयार जाएगी. जिसे 'जूट मैट' कहा जा सकता है. “जूट मैट” को फैक्ट्री थान में तैयार किया जाता है. इसके बाद मिट्टी की सड़क तैयार की जाएगी. उस पर वह जूट मैट बिछा दिया जाएगा. फिर मिट्टी की मोटी परत होगी, उस पर ईंट की ज़मावट करके उसके ऊपर तारकोल की पतली परत डाल दी जाएगी. इस तरह जूट की सड़क तैयार हो जाएगी. रामास्वामी के अनुसार यह सड़क जितनी पुरानी होगी वह उतनी ही मजबूत होती जाएगी. इसकी वजह है कि जूट पानी या नमी में कभी नहीं सड़ता. जूट सिर्फ़ तेज़ धूप या गर्मी में सड़ता और टूटता है. इन वैज्ञानिकों का दावा है कि जूट से बनाई गई सड़क की देखरेख या रखरखाव की भी जरूरत नहीं है. अर्थव्यवस्था डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस तकनीक का प्रदर्शन देखने के बाद कहा कि इस पर बजट की कमी नहीं होने दी जाएगी. अभी जिन पाँच राज्यों में प्रयोग शुरू किया जा रहा है, यदि वहाँ यह सफल होता है तो फिर इसे देश के अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में शुरू किया जाएगा. उन्होंने कहा, "प्लास्टिक कचरे से सड़क बनाने और तारकोल-मिट्टी मिश्रण से सड़क बनाने की तुलना में गाँवों की सड़क जूट से बने और सफल हो तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी." विशेषज्ञ मानते हैं कि आज जूट उत्पादक किसान और उद्योग बदहाली में है. ऐसे में यह तकनीक सफल होती है, तो जूट उद्योग के दिन बदल जाएंगे. |
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