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अहिंसक विरोध की मिसाल बनी शर्मीला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अहिंसक विरोध की मिसाल बन चुकी इरोम शर्मीला करीब छह साल से भूख हड़ताल पर बैठी हैं. प्रशासन के कहने पर उन्हें नाक में नली के ज़रिए खाना खिलाया जा रहा है. फिलहाल 35 साल की शर्मीला चानू मणिपुर की राजधानी इंफाल के जवाहर लाल नहरू अस्पताल में भर्ती हैं और वो वर्ष 2000 से हड़ताल पर हैं. इतना ही नहीं शर्मीला मणिपुर की राजनीति के लिए भी आज किसी मुद्दे से कम नहीं हैं. हर राजनीतिक दल शर्मीला के दम पर वोट हासिल करना चाहता है. शर्मीला की भूख हड़ताल की ये जद्दोजहद इस साल नवंबर में छह साल पूरे कर लेगी. दरअसल शर्मीला की लड़ाई विवादास्पद सुरक्षा बल (विशेष शक्ति) अधिनियम के ख़िलाफ़ है जिसके ज़रिए राज्य में सेना को काफ़ी अधिकार दिए गए हैं. तीन करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में 1980 से ही भारतीय सेना हावी है और मानवाधिकार संगठन इसका विराध करते रहे हैं. अत्याचार राज्य में अलगाववादी संगठनों की सक्रियता के मद्देनज़र सरकार उस कानून को बनाए रखना चाहती है लेकिन सामाजिक और मानवाधिकार संगठन सेना पर ही मानवाधिकर उल्लंघन के आरोप लगा रहे हैं. शर्मीला की लड़ाई भी 10 मणिपुरी युवाओं के असम रायफल्स के जवानों की गोली के शिकार होने की कथित घटना के बाद शुरु हुई. शर्मीला के भाई इरोम संघाजीत कहते हैं, ''ये घटना दो नवंबर सन 2000 की है. उस दिन गुरुवार था. शर्मीला व्रत पर थी और उपवास कर रही थी. उसका वही उपवास आज भी जारी है.''
इस घटना के तीन दिन बाद ही पुलिस ने शर्मीला को आत्महत्या की कोशिश के आरोप में हिरासत में ले लिया. बाद में उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. लेकिन शर्मीला की हालत गंभीर होने के बाद उनको अस्पताल में भर्ती करा दिया गया और तब से शर्मीला का खान-पान नाक में जोड़ी गई पाइप के ज़रिए ही चल रहा है. मजबूत इरादे अस्पताल में बिस्तर पर लेटी शर्मीला ने कहा कि वो किसी के भी दबाव में नहीं आएगी. उन्होंने कहा, '' मेरा इस भूख हड़ताल से हटना तभी संभव हो सकता है जब सरकार बगैर किसी शर्त के आर्मड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को हटाएगी.'' ऐसा नहीं है कि कि शर्मीला इस लड़ाई में अकेली शरीक हो. वर्ष 2004 में कथित तौर पर असम रायफल्स के जवानों ने समाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी के साथ बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी थी जिसके बाद व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. आख़िरकार जनता के दबाव में मणिपुर के कुछ इलाक़ों से विवादास्पद कानून को हटाना पड़ा. लेकिन शर्मीला की मांग है कि इस कानून को पूरे मणिपुर से हटाया जाए. उन्होंने कहा '' मेरी ये हड़ताल मणिपुर के लोगों के लिए हैं ना कि इसमें मेरा कोई निजी मकसद है. ये सत्य,प्यार और शांति का प्रतीक है.'' हालांकि अब ये कयास लग रहे हैं कि शर्मीला की हड़ताल कहीं उनकी मौत का कारण न बन जाए. डॉक्टर भी ससे इनकार नहीं करते कि शर्मीला की हड़ताल उनके स्वास्थ पर बुरा असर डाल रही है और इससे उनके शऱीर के विभिन्न हिस्से प्रभावित हो रहे हैं. भले ही सरकार की नज़रों में शर्मीला की कुर्बानियों का असर नहीं दिख रहा हो लेकिन वो शर्मीला को जीवित रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. प्रयास राज्य के पुलिस महानिदेशक एके पराशर ने कहा, '' देश के एक युवा नागरिक को मरने नहीं दिया जा सकता. ये हमारी जवाबदेही बनती है कि हम देखें कि अप्राकृतिक कारणों से उनकी मौत न हो जाए." वो कहते हैं "हम शर्मीला को ज़िंदा रखने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं. वो अपना काम कर रही है और हम भी अपना कर्तव्य निभा रहे हैं.'' मणिपुर के एक स्थानीय अख़बार के संपादक इरेंगाबम अरुण के मुताबिक प्रसाशन अपने निजी मकसद के लिए शर्मीला को ज़िंदा रखे हुए है. उन्होंने कहा, '' दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन शर्मीला से वाकिफ़ हो चुके हैं. अगर वह मर जाती है तो एक बार फिर से सैन्य बल कानून का मामला केंद्र में आ जाएगा और सरकार ऐसा होने देना नहीं चाहती.'' भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर में लागू 'द आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट' पिछले 26 सालों से मणिपुर में प्रभावी है. इस सिलसिले में सरकार द्वारा गठित एक समिति ने सुझाव दिया है कि इस कानून को रद्द कर दिया जाए लेकिन इसकी रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया गया. रक्षा मंक्षी प्रणव मुखर्जी कहते हैं, ''एएफएसपीए रहना चाहिए क्योंकि सुरक्षा बल भी इसके बगैर अपना कार्य नहीं कर पाएंगे. '' | इससे जुड़ी ख़बरें दिल्ली में गैस पीड़ितों का अनशन11 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नगा एकीकरण की माँग दोहराई16 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस अधिकारों के बावजूद हिंसा की शिकार08 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस उल्फ़ा ने बातचीत की पेशकश की07 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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