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'फ़ैसला आने में कोई ख़ास देरी नहीं हुई है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह कहना सही नहीं है कि मुंबई बम कांड के मामले में फ़ैसले में देरी हुई है, कुछ लोग इसके लिए मुंबई पुलिस और केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को दोषी ठहरा रहे हैं. भूलना नहीं चाहिए कि यह मामला बहुत पेचीदा था, बहुत सारे गवाह थे, ढेर सारे सबूत थे और 123 अभियुक्त थे और उनमें से कई भगोड़े थे, ऐसी स्थिति में हमने छह महीने के भीतर जाँच पूरी करके चार्जशीट दाख़िल कर दिया था. यह भी देखना चाहिए कि यह एक निष्पक्ष मुक़दमा था और इसमें सभी अभियुक्तों को अपनी पूरी सफ़ाई देने का मौक़ा दिया गया इसलिए दुनिया भर में इसे एक विश्वसनीय फ़ैसला माना जाएगा. जहाँ तक देर की बात है तो मैंने ऐसे अनेक आपराधिक मामले देखे हैं जिनमें 25-25 साल लगे हैं. मुझे नहीं लगता कि कोई ख़ास देरी हुई है. 1993 में झारखंड मुक्ति मोर्चा मामला मेरे सामने आया उसमें कोई ख़ास पेचीदगी नहीं थी उसके लिए एक विशेष जाँच दल और विशेष अदालत बनाई गई लेकिन फिर कई साल लग गए. सुधार ज़रूरी असल में न्यायिक प्रक्रिया और जाँच एजेंसी की भूमिका में सुधार किए जाने की बहुत ज़रूरत है. असल में यह काम सरकार को करना होगा, न्यायिक प्रक्रिया में सुधार के तहत प्ली बार्गेनिंग की बात चल रही है. इसके तहत प्रस्ताव रखा गया है कि अगर कोई अपना अपराध स्वीकार कर ले तो उसकी सज़ा कम कर दी जाए और उसकी मदद से अन्य अपराधियों को जल्दी से सज़ा दिलाई जा सके. जाँच एजेंसियों की भूमिका की बात तो हर कोई करता है लेकिन गवाहों की बात भी तो करनी चाहिए, अगर दोषियों को सज़ा दिलाना है तो गवाहों को आगे आना होगा, यहाँ तो शिकायत करने वाले ही पलट जाते हैं, जेसिका लाल हत्याकांड को ही देखिए, अब कहा जा रहा है कि जाँच ठीक से नहीं हुई. जाँच कोई मामूली काम नहीं है, उसमें बहुत सारे पहलुओं पर ग़ौर करना होता है, हमारे देश में दोषियों को सज़ा दिलाना बहुत कठिन काम है, पुलिस के हाथ पाँव बाँधकर कहा जाता है कि ओलंपिक में पदक जीतो. भारत में तो पुलिस के सामने दिए गए बयान की अदालत में कोई अहमियत ही नहीं होती, अब यह कहा जा रहा है कि जिन मामलों में दस वर्ष से अधिक की सज़ा हो सकती है उनमें बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हों ताकि उनकी अदालत में वैधता बनी रहे. यह एक अच्छा क़दम होगा. उदारवाद कई लोग मानवाधिकारों की बात करते हैं लेकिन मेरा मानना है कि मानवाधिकार मानवों के लिए होते हैं, दानवों के लिए नहीं. क्या उन मासूम लोगों के मानवाधिकार नहीं हैं जो इस तरह की हिंसा में मारे जाते हैं. यह देश की सुरक्षा का सवाल है, अगर देश ही नहीं रहेगा तो मानवाधिकार का क्या होगा. मुझे लगता है कि हम ज़रूरत से अधिक उदारता दिखा रहे हैं, लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है कि वह अपने आप को बचाए वर्ना विघटनकारी तत्व उसके ऊपर हावी हो जाएँगे. (अनीश अहलूवालिया से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें संजय दत्त को भी फ़ैसले का इंतज़ार10 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 1993 के बम धमाकों का घटनाक्रम10 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस मुंबई धमाके: न्याय का इंतज़ार09 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस कश्मीर में मुंबई धमाकों से जुड़ी गिरफ़्तारी04 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस मुंबई में सात धमाके, 170 मौतें11 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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