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विद्रोही नेता नवाब अकबर ख़ान बुगटी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बलूचिस्तान के शेर के नाम से जाने जानेवाले नवाब अकबर ख़ान बुगटी का जन्म 12 जुलाई, 1927 को नवाब मेहराब ख़ान के घर में हुआ था. वो बुगटी क़बीले के सरदार शहबाज़ बुगटी के पोते थे. नवाब अकबर ख़ान बुगटी क़बीले के सरदार थे और इस क़बीले के लोगों की संख्या लगभग ढाई लाख है. अकबर बुगटी ने लाहौर के एचिनसन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और 1946 में वो अपने क़बीले के 19वें सरदार बने. 1949 में उन्होंने सरकार की विशेष अनुमति से पाकिस्तान सिविल सर्विस अकादमी से पीएएस की परीक्षा दिए बिना प्रशिक्षण प्राप्त किया. बाद में वो सिंध और बलूचिस्तान के शाही जिरगा के सदस्य मनोनीत हुए. उन्हें 1951 में बलूचिस्तान के गवर्नर जनरल का सलाहकार बनाया गया और मई, 1958 के उपचुनाव में जीत कर वो कुछ समय तक फ़िरोज़ ख़ान नून के मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री के तौर पर शामिल रहे. 1960 में उन्हें क़ैद कर लिया गया और उन पर मुक़दमा चलाया गया जिसके कारण उन्हें किसी भी सरकारी पद से वंचित कर दिया गया. विद्रोही नेता बुगटी 50, 60 और 70 के दशकों में कई नाकाम विद्रोहों में शामिल रहे. 1960 के दशक में वो नेशनल अवामी पार्टी में शामिल हो गए और अयूब ख़ान के दौर में कुछ समय तक जेल में भी रहे.
जब अब्दुल्ला मैंगल बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री बने तो नवाब बुगटी के नेशनल अवामी पार्टी नेतृत्व से मतभेद हो गए. 1973 में जब ज़ुल्फि़क़ार अली भुट्टो ने अवामी पार्टी की सरकार को भंग कर दिया तो अकबर बुगटी को राज्य का गवर्नर बना दिया. वो 10 महीने तक इस पद पर रहे लेकिन भुट्टो से मतभेदों के कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इसके बाद 1973 में वो एयर मार्शल असग़र ख़ान के नेतृत्व में स्थापित तहरीके-इस्तक़लाल पार्टी में शामिल हो गए. फिर 1988 में अकबर बुगटी बलूचिस्तान क़ौमी इत्तेहाद में आ गए. चार फ़रवरी, 1989 को वह राज्य के मुख्यमंत्री चुने गए. उनकी सरकार और बेनज़ीर भुट्टो के नेतृत्ववाली सरकार में हमेशा मतभेद बना रहा और आख़िरकार 6 अगस्त, 1990 में राष्ट्रपति ग़ुलाम इसहाक़ ख़ान के कहने पर राज्यपाल जनरल मोहम्मद मूसा ने अकबर बुगटी की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. 1990 में उन्होंने जम्हूरी वतन पार्टी का गठन किया और वो 1993 में नेशनल असेंबली के सदस्य निर्वाचित हुए. उन्होंने संसद में उर्दू भाषा का बहिष्कार किया. उन्होंने 1997 और 2000 के चुनावों में भाग नहीं लिया. नवाब अकबर बुगटी की मरी क़बीले से रिश्तेदारी थी. बलूच राष्ट्रवादी नेता ख़ैर बख़्श मरी के बेटे और पूर्व राज्यमंत्री सरदार हुमायूं मरी उनके दामाद हैं. 2004 से अकबर बुगटी मरी सरदारों के साथ मिलकर बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे. | इससे जुड़ी ख़बरें बलूचिस्तान में फिर हिंसा भड़की29 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस बुगटी को लेकर भारत-पाक में बयानबाज़ी28 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस बुगटी की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण: भारत28 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस बुगटी की मौत के बाद हिंसा भड़की27 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान के क़बायली नेता की मौत26 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'बलूचिस्तान में सैनिक कार्रवाई में 19 मरे'21 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस बलूचिस्तानः पाकिस्तान का पिछड़ा प्रांत02 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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