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क़ुतुबशाही गुंबदों को संवारने की तैयारी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हैदराबाद की सबसे ख़ूबसूरत और ऐतिहासिक यादगार क़ुतुबशाही गुंबदों में से एक की आनेवाले दिनों में सजावट होने वाली है. गोलकुंडा क़िले के प्रांगण में फैले लंबे चौड़े इब्राहिम बाग़ में भवन निर्माण कला के उन ख़ूबसूरत नमूनों को एक नई ज़िंदगी देने की योजना पर भारत और ईरान के अधिकारी काम कर रहे हैं ताकि दक्कन और ईरान के सदियों पुराने संबंध फिर से बहाल हो सकें. यहाँ के सातों गुंबद क़ुतुबशाही वंश के लोगों के मक़बरे हैं जिन्होंने 200 वर्षों तक यहाँ राज किया और दुनिया को चारमीनार और हैदराबाद शहर का तोहफ़ा दिया. क़ुतुबशाही गुंबदों में ख़ूबसूरत कलाकृतियाँ और नक्काशी का काम आज भी अतीत की शानो-शौकत की याद ताज़ा करता है. इनमें हयात बख़्श बेगम का मक़बरा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है. माँ साहब के नाम से प्रसिद्ध इस स्त्री ने तीन क़ुतुबशाही बादशाहों के काल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. वह एक बादशाह की बेटी, एक शासक की पत्नी और हैदराबाद के संस्थापक क़ुतुब शाह की माँ थीं. इसी कारण माँ साहिबा के लिए सब से शानदार क़ब्र बनाई गई थी और कई साल की मरम्मत और सजावट के बाद यह अभी भी आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है. विशेषता सभी गुंबद ऐसे ऊँचे स्थान पर बनाए गए हैं कि काफी दूर से ही उन्हें देखा जा सकता है. यही इनकी विशेषता है. कुछ मक़बरे दो मंज़िला और कुछ एक मंज़िल के हैं. उन पर पहुँचने के लिए सीढ़ियों का सहारा लेना पड़ता है. सारे मक़बरे, उनकी कमानें और दीवारें बिल्कुल बराबर एक ही अंदाज़ में एक ही प्रकार से बनाई गई हैं. हर भवन के बीच में क़ब्रों की निशानियाँ बनी हुई हैं. किसी ज़माने में इन सभी क़ब्रों पर बेशक़ीमती नीले और हरे रंग की पट्टिका लगी हुई थी लेकिन बाद में वे चोरी हो गए. अब आंध्रप्रदेश सरकार न केवल इन तमाम गुंबदों बल्कि पूरे इब्राहिम बाग़, उसमें स्थित हयात बख़्शी मस्जिद और सराए को भी नवजीवन देना चाहती है. पर्यटन और संस्कृति राज्य मंत्री डॉ जे गीता रेड्डी का कहना है कि 10 करोड़ रुपए की इस परियोजना का मक़सद इस क्षेत्र को इतना सुंदर और आकर्षक बना देना है कि इसे विश्व सांस्कृतिक सूची में जगह मिल जाए. ईरानी दिलचस्पी हैदराबाद में स्थित ईरानी दूतावास भी इस परियोजना में गहरी दिलचस्पी ले रहा है. ईरानी सरकार के 'सेंटर फ़ॉर हेरीटेज मोनुमेंट' के निदेशक डॉ ख़ुशनवीस ने इस संबंध में राज्य के अधिकारियों से बातचीत की है.
हैदराबाद में ईरान के दूत जनरल हुसैन राविश का कहना है कि ईरान पहली बार देश से बाहर किसी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए काम करेगा. गीता रेड्डी ने बताया कि ईरानी विशेषज्ञों की टीम बहुत ज़ल्द हैदराबाद का दौरा करेगी ताकि परियोजना को अंतिम रुप दिया जा सके. राज्य में पर्यटन मंत्रालय की मुख्य सचिव चित्रा रामचंद्रन ने बीबीसी को बताया कि इस परियोजना के तहत क़ुतुबशाही गुंबदों के गिर्द ईरानी शैली के एक बाग़ को विकसित किया जाएगा जिनमें बाग़ीचे, क्यारियाँ और झील होंगी. यह बाग़ पूरी तरह इसफ़हान के नमूने पर बनाया जाएगा. हाल ही में इसफ़हान के दौरे से वापस लौटीं गीता रेड्डी ने बीबीसी को बताया कि वो इसफ़हान और हैदराबाद की समानता देखकर हैरान रह गईं और ख़ुद ईरानी अधिकारी भी इस बात से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस परियोजना को अपने हाथ में लेने की रज़ामंदी ज़ाहिर कर दी. यहां यह बात महत्वपूर्ण है कि क़ुतुबशाही वंश ईरान से आया था और उसने दक्कन में भवनों, महलों, ऐतिहासिक स्मारकों और मक़बरों की जो विरासत छोड़ी है उस पर ईरानी शैली का छाप बिल्कुल स्पष्ट है. इसका कारण यह है कि उन शासकों ने भवनों के निर्माण के लिए ईरान से इंजीनियरों, भवन निर्माताओं और दूसरे विशेषज्ञों की एक बड़ी टीम को आमंत्रित किया था. राज्य सरकार को आशा है कि ईरानी विशेषज्ञों के यहाँ आने से न सिर्फ़ उन स्मारकों की असली सुंदरता और रौनक़ बहाल होगी और हैदराबाद पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय नक़्शे पर एक महत्वपूर्ण स्थान बनकर उभरेगा बल्कि ईरान और हैदराबाद के पुराने संबंधों को भी नया आयाम मिलेगा. सरकार इस परियोजना को इस प्रकार क्रियान्वित करना चाहती है कि इन मक़बरों और दूसरी इमारतों के मूल स्वरुप को कोई नुक़सान न पहुँचे. इसके अतिरिक्त ईरानी विशेषज्ञ चारमीनार और गोलकुंडा क़िला की सजावट में दिलचस्पी रखते हैं ताकि हैदराबाद के शानदार ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा हो सके. गीता रेड्डी को उम्मीद है यह परियोजना हैदराबाद की ख़ूबसूरती में चार चांद लगा देगी. | इससे जुड़ी ख़बरें इतिहास बनी दीवार लेखन की कला26 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस हड़प्पा सभ्यता पर नया प्रकाश 18 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस ऐतिहासिक इमारतें और धर्म13 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस लाल क़िले को मिली सेना से मुक्ति22 दिसंबर, 2003 | भारत और पड़ोस भोजशाला एक ऐतिहासिक जगह18 फ़रवरी, 2003 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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