|
जूतों के साथ होती है भाषा की मरम्मत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असम के छोटे-से क़स्बे नलबाड़ी के एक स्कूल के बाहर पटरी पर एक आदमी रोज़ सुबह आता है. इक्का-दुक्का ग्राहकों के जूते-चप्पलों की मरम्मत से उनके घर का चूल्हा जलता है. और रामदास हरिजन नामक इस व्यक्ति की दुकान पर जब ग्राहक नहीं रहते तब चलती है साहित्यिक गपशप. अड्डे पर आने वालों में असमिया साहित्य के विशिष्ट आलोचक शशि शर्मा, डा शुभ्रकिंकर गोस्वामी, पीपुल्स पब्लिकेशन के प्रतुल शर्मा, लेखक भवेन कलिता जैसे साहित्यकार होते हैं. रामदास हरिजन उन्हें बैठने के लिए खाली बॉक्स देते हैं. राज्य के दैनिक अख़बार, साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिकाओं में उनकी सैकड़ों कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं. उनके एक नाटक को राज्य स्तर पर दूसरी सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार मिल चुका है. अपने कई नाटकों का वो ख़ुद निर्देशन कर चुके हैं. रामदास की कविताओं का एक संकलन हाल ही में डा शुभ्रकिंकर गोस्वामी ने प्रकाशित करवाया है. शुरुआत में उनकी दुकान के सामने से आने-जाने वालों को कभी यह ख़याल नहीं आया कि ये मोची दूसरे मोचियों से अलग है. सम्मान उनकी ठौर पर बैठने वाले साहित्यकारों ने जब वहां से गुजरने वाले साहित्यप्रेमियों और अपने परिचितों को उनका परिचय देना शुरू किया तो धीरे-धीरे रामदास हरिजन नलबाड़ी का प्यारा खुड़ा या चाचा बन गए. उन्हें 'तू' और 'तुम' बोलने वालों की संख्या कम होती गई और 'आप' बोलने वाले लोग बढ़ते गए. सैकड़ों कविताओं, 16 नाटकों और कई कहानियों के रचयिता रामदास हरिजन आज भी अपने पुश्तैनी मिट्टी के फर्श वाले घर में रहते हैं. नलबाड़ी की देवीराम पाठशाला में उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. अपनी प्रतिभा के लिए वे ज़ल्दी ही अपने गुरुओं की प्रशंसा के पात्र बन गए.
चौथी कक्षा में ही उन्होंने पहली कविता लिखी और जब हेडमास्टर को दिखाई तो वे बहुत ख़ुश हुए और आगे लिखते रहने की प्रेरणा दी. इसके बाद नलबाड़ी में रहने वाले असमिया साहित्य के विशिष्ट आलोचक शशि शर्मा ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. दसवीं पास करने के बाद रामदास ने प्रेस सहित कई तरह के कामों में अपना भाग्य आज़माने की कोशिश की लेकिन किसी भी काम से उन्हें दो जून की रोटी नसीब नहीं हुई. अंत में उन्हें जूते चप्पलों की मरम्मत के अपने पुश्तैनी धंधे की ओर लौटना पड़ा. नलबाड़ी क़स्बे की शायद ही कोई संस्था होगी जिसने रामदास हरिजन का सार्वजनिक अभिनंदन न किया हो. लेकिन असम सरकार द्वारा साहित्यकारों को दी जाने वाली पेंशन आज तक रामदास हरिजन के लिए स्वीकृत नहीं हो सकी. इसका नलबाड़ीवासियों को खेद है. रामदास इधर बीमार चल रहे हैं. कई बार अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं. शशि शर्मा ने अख़बारों के माध्यम से सरकार से अपील की है कि इस बार स्वाधीनता दिवस के मौके पर रामदास की साहित्यिक पेंशन मंजूर कर ली जाए. | इससे जुड़ी ख़बरें शायरी का अनुवाद कितना जायज़?31 जुलाई, 2006 | मनोरंजन साहित्य का सांस्कृतिक करिश्मा22 जून, 2006 | मनोरंजन एक पुलिस अधिकारी का अलग सा मिशन22 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'ट्विंकल ट्विंकल' पर लगी पाबंदी14 जून, 2006 | भारत और पड़ोस ज्ञान बाँटने की अथक कोशिश18 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||