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ज्ञान बाँटने की अथक कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में मोबाइल लाइब्रेरी का चलन अब काफ़ी पुराना हो चुका है लेकिन कोलकाता के एक व्यक्ति इसे एक क़दम और आगे ले गए हैं. आकाश अली पाइक ने किताबों को घर-घर पहुँचाने का बीड़ा उठाया है. वे अपनी वैन के जरिए पाठकों तक उनकी मनपसंद किताबें पहुंचाते हैं. बस इसके लिए उनको एक फोन करना ही काफी है. इसके एवज में पाइक हर पाठक से मासिक पाँच रुपए का शुल्क लेते हैं लेकिन बहुत गरीब लोगों को वे मुफ्त में ही किताबें देते हैं. कठिन संघर्ष अपनी पूरी ज़िंदगी ग़रीबी में गुजारने वाले पाइक ने वर्ष 1998 में पचास पुस्तकों से इस मोबाइल लाइब्रेरी की स्थापना की थी. उनकी इस लाइब्रेरी में अब साहित्य, राजनीति, खेल और विज्ञान समेत विभिन्न विषयों पर बांग्ला, अंग्रेजी और हिंदी में सात हजार से ज्यादा पुस्तकें हैं.
पाइक कहते हैं कि "इस पुस्तकालय पर दो लाख रुपए की लागत आई है. इसके लिए राजा राम मोहन राय फाउंडेशन ने कुछ आर्थिक सहायता दी है." वे इस वैन के साथ घूमते रहते हैं और फोन करने वाले किसी भी व्यक्ति को किताबें पढ़ने के लिए देते हैं. वे बताते हैं कि "आर्थिक तंगी के कारण मैं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सका. मैं जानता हूं कि अशिक्षा जीवन के लिए एक अभिशाप बन सकती है. इसलिए मैंने बरसों से ज्ञान के प्रसार को ही अपना मिशन बना लिया है." पाइक ने वर्ष 1970 में 20 साल की उम्र से ही पेट काट-काट कर किताबें खरीदनी शुरू कीं. उसके बाद 35 वर्षों के दौरान अपने काम में उनको काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी. कम कमाई पहले वे कोलकाता की कुछ छोटी लाइब्रेरियों में लाइब्रेरियन रह चुके हैं. उनके बंद हो जाने के बाद उन्होंने घर-घर पुस्तकें पहुँचाने को ही अपना पूर्णकालिक पेशा बना लिया. राज्य सरकार ने वर्ष 1999 में उनके इस पुस्तकालय का पंजीकरण भी कर दिया.
अब 55 साल की उम्र में भी उनकी मासिक आय महज 12 सौ रुपए ही है लेकिन इसके बावजूद पाइक के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है. वे बताते हैं कि "फिलहाल लाइब्रेरी के 238 सदस्य हैं. इनमें बच्चों और महिलाओं से लेकर पेशेवर लोग तक शामिल हैं. मेरे पास बच्चों की कहानियों से लेकर राजनीतिक और साहित्यिक तक सबकी पसंद की किताबें हैं. इनमें प्रेमचंद, शरतचंद्र से लेकर शरलॉक होम्स तक की पुस्तकें शामिल हैं." इस काम ने उनको पूरे इलाके में लोकप्रिय बना दिया है. पाइक की लाइब्रेरी के एक सदस्य मोहम्मद काजिम अली शेख कहते हैं कि "यह बहुत आसान है. हमें घर बैठे मनपसंद किताबें पढ़ने को मिल जाती हैं." एक अन्य सदस्य सुनील सरकार कहते हैं कि "वे हमें पढ़ने के लिए बढ़िया किताबें दे जाते हैं. उनसे हमारा ज्ञान बढ़ता है." महानगर के पूर्वी इलाके में कहीं भी चले जाइए, पाइक अपनी वैन चलाते या फिर पाठकों को किताबें देते नजर आ जाएँगे. |
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