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मंगलवार, 01 अगस्त, 2006 को 18:42 GMT तक के समाचार
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दिल्ली में रहते हैं चंगेज़ ख़ां के वंशज

नसीम मिर्ज़ा
नसीम मिर्ज़ा चंग़ेज ख़ां किए पर शर्मिंदा तो नहीं हैं लेकिन सबक लेने की सलाह देते हैं
मध्यकालीन इतिहास के सबसे आक्रामक शासकों में शुमार चंगेज़ ख़ां के पोते हलाकू दिल्ली आए थे. उनके साथ आए चंगेज़ ख़ां के खानदान के कई लोग दिल्ली छोड़ कर वापस नहीं गए.

जो नहीं गए उनके वंशज आज भी मौजूद हैं. इनमें से एक हैं नसीम मिर्ज़ा चंग़ेज़ी. ये चंग़ेज़ ख़ां की 23वीं पीढ़ी के नुमांइदे हैं.

उन्हें चंगेज़ ख़ां से जुड़ा इतिहास बखूबी याद है. वो बताते हैं कि चंग़ेज़ ख़ां के बाद हलाकू ख़ां ने सन 1258 में दोबारा मध्य एशिया का रुख़ किया और इराक़ जैसे सुसंस्कृत देश को तबाह कर दिया.

हलाकू की फ़ौज तातारी कहलाती थी और उसका भय पूरे इलाक़े में फैल गया था.

तब भारत में सुल्तान नसीर और महमूद ख़ां की हुकूमत थी. सुल्तान ने हलाक़ू की तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और वो मेहमान के तौर पर दिल्ली आया था.

96 साल के नसीम मिर्ज़ा बताते हैं कि तब हलाक़ू के साथ आए उनके ख़ानदान के कई लोग भारत में ही रुक गए.

नसीम मिर्ज़ा कहते है कि उनका संबंध चंगेज़ ख़ां के बोज़ी गोन क़बीले से हैं.

यादें

दिल्ली के जामा मस्जिद इलाक़े में रहने वाले नसीम मिर्ज़ा का कहना है कि भारत में बाबर का शासन क़ायम होने के बाद उनके परिवार को फलने फूलने का बहुत मौक़ा मिला.

लेकिन आज उनके पास अपने ख़ानदान की ऐतिहासिक तस्वीरों और यादों के सिवा कुछ भी नही हैं.

नसीम मिर्ज़ा
अपने पूर्वजों की चंद तस्वीरें ही नसीम मिर्ज़ा की जमापूंजी है

अंग्रेज़ों के ज़माने में सेना में अधिकारी रह चुके नसीम मिर्ज़ा अब भी राष्ट्रीय एकता के नाम पर कहीं भी चल पड़ते हैं.

नसीम मिर्ज़ा चंगेज़ी ने गांधीजी के अनुयायी आसिफ़ अली के साथ कंधे से कंधा मिला कर जंगे-ए-आज़ादी में हिस्सा लिया.

वो शहीद भगतसिंह के साथ भी रहे लेकिन उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का लाभ महज़ इसलिए नहीं मिल सका क्योंकि वो एक दिन के लिए भी जेल नहीं जा पाए.

बँटवारे के वक्त उनके पूरे ख़ानदान के साथ दो बेटे भी पाकिस्तान चले गए लेकिन नसीम मिर्ज़ा को पाकिस्तान जाना गवारा नही हुआ.

आज़ादी के बाद उन्होंने दिल्ली नगर निगम में नौकरी की. अब पेंशन और मकान के किराए से वो गुज़र बसर कर रहे हैं.

वो इस उम्र में भी अच्छी सेहत का राज़ कम खाना, कम बोलना और कम सोना बताते हैं. उनकी तमन्ना सवा सौ साल जीने की है.

चंगेज़ ख़ां और हलाकू के रक्तरंजित इतिहास से वो शर्मिंदा तो नहीं हैं लेकिन वो उन घटनाओं और उन हस्तियों से सबक़ लेते हैं और सबको सबक़ भी देते हैं. वो कहते है:

जिनके डंको से दहलते थे ज़मीं और आसमां
कैसे सोते हैं वो मक़बरों में, हाँ न हूँ कुछ भी नहीं

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