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ख़स्ताहाल है चुनार का चीनी मिट्टी उद्योग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बाबू देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों और टीवी धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ के चलते इतिहास में समा चुका चुनार अपने चीनी मिट्टी व प्लास्टर ऑफ पेरिस के बर्तनों और सजावटी सामानों के लिए भी मशहूर है. लेकिन जिस तिलस्म के लिए चुनार और उसके किले की चर्चा होती है, वह इस उद्योग पर बेअसर साबित हो रहा है. उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर ज़िले में मिर्ज़ापुर-बनारस हाइवे पर स्थित इस कस्बे का चीनी मिट्टी उद्योग सरकारी संरक्षण के अभाव और बिचौलियों के चलते आखिरी सांसें गिन रहा है. यहाँ डेढ़ सौ घरों के लगभग ढाई हज़ार लोग इस धंधे से जुड़े हैं. इनमें महिलाएं भी हैं और बच्चे भी. हाइवे के किनारे दुकान लगाने वाले राजेश कुमार प्रजापति कहते हैं, ''यह हमारा पुश्तैनी धंधा है. लेकिन अब इसमें पहले जैसी बात नहीं रहा. अब ग्राहकों का टोटा है. बिचौलिए काफी कम कीमत पर माल खरीद कर ऊंचे दाम पर देश के बड़े शहरों और विदेशों में भेज देते हैं. यहां कारीगरों के लिए तो पेट चलाना तक मुहाल हो गया है.'' बिचौलिए राजेश कहते हैं, ''सरकार की ओर से सहायता नहीं के बराबर ही मिलती है. छोटे कलाकारों को न तो कर्ज मिलता है और न ही निर्यात में कोई सहायता. कर्ज लेने के लिए भी 20 फीसदी रकम रिश्वत में देनी पड़ती है.'' गंगाराम प्रजापति मिट्टी से कुछ ही देर में हुबहू किसी का चेहरा बना सकते हैं. 40 साल से इस धंधे से जुड़े गंगाराम कहते हैं, ''बिचौलिए सारा मुनाफा लूट लेते हैं. सरकार ने कलाकारों के संरक्षण के लिए कोई कदम नहीं उठाया है.'' बहुत पहले चुनार में एक चीनी पात्र विकास केंद्र की स्थापना की गई थी. लेकिन वह भी अरसे से बंद पड़ा है. यहाँ एक ग़ैरसरकारी संगठन महिला उन्नयन संस्था जरूर है. लेकिन संसाधनों के अभाव में वह भी खास कुछ नहीं कर सकी है. चुनार में बने चीनी मिट्टी के बर्तन और दूसरे सजावटी सामान अपनी कसीदाकारी और खूबसूरती के कारण बरबस ही लोगों का मन मोह लेते हैं.लेकिन इससे जुड़े लोगों का जीवन दिन-ब-दिन बदरंग ही होता जा रहा है. नंदलाल प्रजापति कहते हैं कि अगर सरकार ने जल्दी ही इस ओर ध्यान नहीं दिया तो हमारे सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. |
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