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शनिवार, 06 मई, 2006 को 06:50 GMT तक के समाचार
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ख़ुश हैं कश्मीर के फल-मेवा व्यापारी

बाज़ार में सेब
कश्मीरी सेब को दूसरे प्रदेशों के मंडियों तक भेजना व्यापारियों के लिए खर्चीला होता है
श्रीनगर-मुजफ्फ़राबाद मार्ग पर मालवाहक गाड़ियों की आवाजाही शुरू करने के फ़ैसले पर भारत प्रशासित कश्मीर में फल और मेवा व्यापारी काफ़ी ख़ुश दिखाई दे रहे हैं.

उनका कहना है कि इससे फल और मेवा यानी ड्राइ-फ़्रूट्स उद्योग को काफी बढ़ावा मिलेगा.

इस मार्ग पर बस सेवा शुरु होने को एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद जुलाई से ट्रकों की आवाजाही शुरु करने की घोषणा की गई है.

व्यापारियों को लगता है कि भारत की तुलना में पाकिस्तान की मंडियाँ उनके पहुँच में ज़्यादा हैं और इससे उन्हें लाभ ज़्यादा मिल सकता है.

हालांकि वे चाहते हैं कि व्यापार के लिए नियम शर्तें वैसी न हों जैसी कि यात्रियों के लिए हैं वरना मार्ग खोलने का कोई फ़ायदा ही नहीं होगा.

मेवा व्यापारी बशीर अहमद बशीर का कहना है कि ये अच्छी ख़बर ऐसे समय आई है जब कई वर्षों से सूखे के कारण फल उद्योग संकट के दौर से गुज़र रहा है.

 इस समय हमारे लिए सबसे पास की मंडी जम्मू शहर में है और वो श्रीनगर से तीन सौ किलोमीटर दूर है. जबकि मुजफ्फ़राबाद की दूरी ज़्यादा से ज़्यादा 170 किलोमीटर है
अनिल कुमार, व्यापारी

वे कहते हैं, ‘‘अगर ये शुरु हुआ तो फल और मेवे सिर्फ़ मुज़फ़्फ़राबाद तक नहीं, वहाँ के रास्ते पाकिस्तान के सभी शहरों में जाएँगे. चूँकि वहाँ से बंदरगाह नज़दीक है इसलिए मध्यपूर्व के देशों में भी इसका निर्यात हो सकेगा."

वे कहते हैं कि फल और मेवे की वजह से ही घाटी की अर्थव्यवस्था क़ायम है, हालांकि पिछले तीन चार साल इसके लिए बहुत बुरे रहे हैं.

मंडी

व्यापारियों का कहना है कि उन्हें भारत की विभिन्न मंडियों में अपना फल-मेवा पहुँचाने में काफ़ी किराया लगता है.

उनका कहना है कि इसके बाद उन्हें इस फल के वो दाम नहीं मिलते जिस से कि उनको फ़ायदा हो. वे कहते हैं कि इसके विपरीत मुजफ्फराबाद और पाकिस्तान की दूसरी मंडियों तक फल-मेवा पहुँचाने में काफी कम खर्च होता है.

माल ढुलाई
श्रीनगर से पाकिस्तान की मंडियों में माल भेजना कम खर्चीला होगा

अनिल कुमार जम्मू शहर के रहने वाले हैं लेकिन वे श्रीनगर में कारोबार करते हैं.

वे कहते हैं, ‘‘इस समय हमारे लिए सबसे पास की मंडी जम्मू शहर में है और वो श्रीनगर से तीन सौ किलोमीटर दूर है. जबकि मुजफ्फ़राबाद की दूरी ज़्यादा से ज़्यादा 170 किलोमीटर है.’’

कुमार का कहना है कि भारत बेशक एक बहुत बड़ा मार्केट है लेकिन वे कहते हैं कि यहाँ की मंडियों में हिमाचल और उत्तर प्रदेश से भी बड़ी मात्रा में फल आते हैं.

वे कहते हैं, ‘‘पाकिस्तान हमें ऐसी जगह मिल रही है जहाँ सेब काफी कम मात्रा में पैदा होता है इससे हमें काफी बड़ा मार्केट मिल जाएगा.’’

अनिल कुमार कहते हैं कि पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर के फल और मेवे अफगानिस्तान, ईरान और कज़ाकिस्तान तक पहुँचाए जा सकते हैं.

 वीज़ा तो परमिट से भी आसान है. अभी तीन या चार सौ लोग ही इस बस में मुजफ्फ़राबाद जा सके है. कभी पति को परमिट मिला तो पत्नी को नहीं मिला. अगर इसी तरह व्यापार भी होगा तो ठीक नहीं होगा
इम्तियाज़, महासचिव, फ़्रूट ग्रोवर्स एसोसिएशन

उनका कहना है, "जो चीज़ हम 80 रुपए की लागत से मुंबई पहुँचा रहे हैं वही 60 रुपए का भाड़ा देकर ईरान पहुँचा सकते हैं."

ग़ुलाम अहमद इम्तियाज़ जम्मू कश्मीर फ्रूट ग्रोवर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं.

वे कहते हैं. ‘‘ इतने बड़े हिंदुस्तान से फल पैदा करने वाले को कुछ नहीं मिल रहा. आमतौर पर तो किसान को उसका लागत मूल्य भी नहीं मिल पाता. पाकिस्तान का बाज़ार मिलने पर कुछ तो पैसे बचेंगे.’’

रवैये का सवाल

इम्तियाज़ ख़ुश तो हैं लेकिन उनकी कई आशंकाएं भी हैं.

‘‘हमें बहुत ख़ुशी है कि यहाँ से भी तिजारत शुरू हो गई. लेकिन यदि यहाँ से वहाँ जाने और आने को लेकर तरीक़ा वैसा ही रहा जैसा बस यात्रियों का है तो व्यापार करना कठिन ही होगा.’’

श्रीनगर मुज़फ़्फ़राबाद बस
श्रीनगर से मुजफ़्फ़राबाद बस सेवा 2005 के अप्रैल में शुरु की गई थी

वैसे श्रीनगर और मुजफ्फ़राबाद के बीच बस में सफर करने वाले यात्रियों के लिए वीज़ा की आवश्यकता नहीं है लेकिन इम्तियाज़ का कहना है कि इसके बावजूद दोनों और के अधिकारियों ने बस यात्रा को इतना मुश्किल बना दिया कि इसका मक़सद खत्म हो गया.

वो कहते हैं, ‘‘वीज़ा तो परमिट से भी आसान है. अभी तीन या चार सौ लोग ही इस बस में मुजफ्फ़राबाद जा सके है. कभी पति को परमिट मिला तो पत्नी को नहीं मिला. अगर इसी तरह व्यापार भी होगा तो ठीक नहीं होगा.’’

अनिल कुमार भी कहते हैं कि यदि व्यापारियों को आवाजाही की खुली छूट न दी गई तो कारोबार नहीं हो सकेगा.

व्यापारी कहते हैं कि जब भी सरकारें इस व्यापार की रुपरेखा तैयार करे तो उन बैठकों में व्यापारियों को भी शामिल करना चाहिए जिससे कि व्यावहारिक दिक़्क़तों पर चर्चा हो सके.

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