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दिशा स्वयं नेपाली जनता तय करे: भारत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने नेपाल में लोकतंत्र की बहाली का समर्थन करते हुए कहा है कि भविष्य की क्या दिशा हो यह नेपाल की जनता को तय करना है. नई दिल्ली में संवाददाताओं से बातचीत में भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन ने कहा, "भारत सरकार को इस बारे में कहने का हक़ नहीं है कि नेपाल में चुनाव हो कि नहीं, या वहाँ संविधान सभा का गठन किया जाए कि नहीं." उन्होंने कहा कि नेपाल में लोकतंत्र अवश्य स्थापित होना चाहिए क्योंकि जनता लोकतंत्र चाहती है. सरन ने कहा कि भारत सरकार नेपाली राजनीतिक दलों और नेपाल नरेश के कार्यालय के संपर्क में है ताकि वहाँ स्थिति सामान्य बनाने में यथासंभव रचनात्मक भूमिका निभाई जा सके. हालाँकि सरन ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार माओवादियों के संपर्क में नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत सरकार हमेशा से यही विचार रहा है कि नेपाल की समस्या को कोई सैनिक समाधान नहीं है, और इसका राजनीतिक हल ही संभव है. सरन ने कहा कि माओवादियों को सबसे पहले हिंसा का त्याग करना चाहिए. 'नीति अपरिवर्तित' इसबीच समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि नेपाल को लेकर भारत की इस मान्यता में कोई बदलाव नहीं आया है कि नेपाल की राजनीति के दो स्तंभ हैं- एक संवैधानिक राजतंत्र और दूसरा बहुदलीय लोकतंत्र. जर्मनी यात्रा के दौरान विमान पर संवाददाताओं से बात करते हुए प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत की इस नीति में कोई बदलाव नहीं आया है. इससे पहले शुक्रवार को भारत ने नेपाल नरेश की सत्ता जनता को सौंपने की घोषणा का स्वागत करते हुए इसे वहाँ राजनीतिक स्थायित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम बताया था. | इससे जुड़ी ख़बरें विपक्ष ने नरेश का प्रस्ताव ठुकराया22 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस नेपाल में प्रदर्शनकारी फिर सड़कों पर22 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस एक प्रदर्शनकारी की मौत21 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस ज्ञानेंद्र ने लोकतंत्र बहाली की माँग मानी21 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस क्या राजा ज्ञानेंद्र ने बहुत देर कर दी?21 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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