|
'सच्चे आरोप अदालत की अवमानना नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय लोकतंत्र के दो स्तंभों न्यायपालिका और मीडिया के बीच हमेशा इस बात को लेकर तनाव रहता था कि क्या मीडिया के ज़रिए लगाए गए आरोप अदालत की अवमानना करते रहे हैं चाहे ये आरोप सच ही क्यों न हों. अब ये तनातनी समाप्त हो सकती है क्योंकि लोकसभा में विधेयक पारित कर दिया गया है कि अब सच्चे आरोपों को अदालत की अवमानना के घेरे से अलग रखा जाएगा. लोकसभा में अदालत की अवमानना संबंधी विधेयक में लाया गया संशोधन पारित करते हुए ये बात जोड़ी गई कि अगर आरोप सच हों तो कोई भी इसका इस्तेमाल अपने बचाव में कर सकता है. यानी अगर कोई व्यक्ति अदालत पर या न्यायाधीशों पर कोई आरोप लगाता है और अगर आरोपों को सही साबित करने के लिए उसके पास सबूत हों तो उसे अदालत की अवमानना नहीं माना जा सकता. इस विधेयक के संबंध में संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, "ये देर से किया गया फ़ैसला है. यह तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था. ये विडंबना ही थी कि आप सच बोल रहे हों और आपके ऊपर अदालती कार्रवाई हो जाए. संविधान समीक्षा आयोग में भी मैंने इसके लिए बहुत ज़ोर लगाया था." अदालत के साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया के संबंध कभी भी बहुत अच्छे नहीं रहे हैं. पिछले दिनों जानीं-मानीं लेखिका अरुंधति रॉय को इसी तरह के एक मामले में एक दिन की सज़ा सुनाई गई थी. राज्यसभा सांसद और पत्रकार चंदन मित्रा भी इसका शिकार हो चुके हैं. चंदन मित्रा को दो मामलों में अदालत से नोटिस मिला था. एक मामले में उन्होंने पंजाब पुलिस के ख़िलाफ दिए गए अदालती फ़ैसले के बारे में लिखा था कि इससे न्यायाधीशों की मंशा पर सवाल उठते हैं. प्रशंसा दूसरे मामले में उन्होंने सुखराम की डायरी का ज़िक्र करते हुए कहा था कि इसमें कई न्य़ायाधीशों के नाम हैं . चंदन के इस रिपोर्ट पर अदालत ने संज्ञान लिया था और नोटिस दिया था.
चंदन मित्रा ने भी इस विधेयक की तारीफ़ की और कहा कि पहले विचित्र स्थिति थी कि सबूत और सच्चाई के बावजूद पत्रकारों को हमेशा अदालत का डर लगा रहता था. कर्नाटक में पिछले दिनों सेक्स स्कैंडल में भी जब पत्रकारों ने न्यायाधीशों के रवैये के संबंध में लिखा तो अदालती अवमानना का मसला उठ खड़ा हुआ था. विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि उसी सच को अवमानना के घेरे में नहीं रखा गया है जो जनहित में हैं. कोई बयान या आरोप जनहित में है या नहीं यह तय करने का अधिकार कोर्ट को ही दिया गया है. इस बारे में क़ानून विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं, "अंतिम फ़ैसला तो कोर्ट को ही करना है लेकिन कम से कम डर ख़त्म हुआ कि सच बोलें तो मुश्किल नहीं होगी." यह विधेयक पारित तो हो गया है और ज़्यादातर लोग इसे देर से किया गया महत्वपूर्ण फ़ैसला बता रहे हैं. एक राय ये भी है कि अब अदालती फ़ैसलों की अधिक आलोचना होगी और आरोप भी अधिक लगाए जाएँगे. बहरहाल आरोपों और प्रत्यारोपों के इस दौर में सच्चाई किसी को कितना बचा पाएगी ये देखना दिलचस्प रहेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अदालती फ़ैसले पर राजनीति उचित नहीं'23 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस क्या आम आदमी पर नज़र है अदालतों की?25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस 'शरीयत अदालतें समानांतर अदालतें नहीं'28 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस सरकार ने कहा, अदालतें ही सर्वोपरि17 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस शरीयत अदालतों पर नोटिस16 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस अदालत का एक फ़ैसला और कई सवाल20 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए राहत की उम्मीद20 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस डॉक्टर की चूक अपराध नहीं-अदालत05 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||