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जानलेवा हो सकता है एसबेस्टस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गांव की पाठशाला, झुग्गी बस्तियों, रेलवे प्लेटफ़ार्मों, बस अड्डों और सरकारी गोदामों की नालीदार चादरों वाली छत हो या फिर घरों तक पानी पहुँचाने वाली पाइप लाइन. चिकित्सा और बिजली के तमाम ज़रूरी सामान हों, रसोईघर में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें हों या फिर गाड़ियों के कलपुर्ज़ें और कारगिल के सैनिक बंकर. इन सभी में एक चीज़ समान है और वह है एसबेस्टस. सीमेंट जैसी ख़ासियत वाले इस पदार्थ का इस्तेमाल भारत में क़रीब तीन हज़ार तरह के सामान तैयार करने में होता है. पिछले दिनों फ़्रांसीसी नौसेना से हटाए गया एक युद्धपोत, क्लेमांसु जब तोड़ने के लिए भारत की ओर रवाना हुआ तो एसबेस्टस जैसे पदार्थ पर बहस फिर से शुरू हो गई. वजह यह है कि एसबेस्टस ज़हरीला पदार्थ है. एसबेस्टस से फेफड़ों का कैंसर तक हो सकता है और इस जहाज़ में क़रीब 100 टन एसबेस्टस लदा हुआ है. अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस सहित कई संगठनों से इसका विरोध भी किया है. क्लेमांसु नाम के इस जहाज़ को भारत लाने के मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी ने पिछले दिनों कहा था कि जहाज़ को भारत की तटीय सीमाओं से तब तक दूर रखा जाए, जब तक कि इसके बारे में सारी जानकारी नहीं मिल जाती. क्लेमांसु को तोड़ने का काम जिस कंपनी को सौंपा गया है, उसने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि जहाज़ को 13 फ़रवरी तक भारतीय तटों से 200 नॉटिकल मील की दूरी पर रखा जाएगा. दुनिया के तमाम देशों ख़ासकर यूरोपियन यूनियन और पश्चिमी देशों में इसका प्रयोग प्रतिबंधित है क्योंकि आँकड़ों के मुताबिक़ इसके दुष्प्रभावों से हज़ारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. एसबेस्टस उद्योग पर ऐसा नहीं है कि एसबेस्टस के ख़िलाफ़ दी जा रही दलीलों से भारतीय बाज़ार और उद्योग जगत अनभिज्ञ है. भारत में एसबेस्टस की कई खदानें हैं और इससे तरह-तरह के सामान बनाने वाले कई कारखाने भी. इन कारखानों का सालाना कारोबार लगभग दो हज़ार करोड़ रूपए का है. एसबेस्टस पर अपना मत रखने के लिए इन कंपनियों ने एक मंच भी बना रखा है. एसबेस्टस सीमेंट प्रॉडेक्ट मैन्यूफ़ैक्चरर्स एसोसिएशन के निदेशक, एके शेट्टी बताते हैं कि भारत एक ग़रम जलवायु वाला देश है और यहाँ इसका लोगों पर बुरा असर नहीं पड़ेगा. वो बताते हैं, "मैं मानता हूँ कि पश्चिम के देशों में इसका लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा है पर भारत के संदर्भ में ऐसा कहना ग़लत है. हम अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर काम करते हैं और यह कुछ लोगों की चाल है जो एसबेस्टस की जगह अन्य विकल्पों को सामने लाना चाहते हैं क्योंकि इसमें उनके अपने हित छुपे हैं." उन्होंने बताया, "आज तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि इसके कारखाने में काम करनेवाले मजदूर इसके सीधे संपर्क में नहीं आते और वे इसके दुष्प्रभावों से दूर हैं." विरोध एसबेस्टस के इस्तेमाल का विरोध करने वालों के पास सबसे बड़ा तर्क है इससे होने वाली बीमारियाँ. एसबेस्टस के उपयोग के ख़िलाफ़ काम कर रहे संगठन, बैन एसबेस्टस नेटवर्क ऑफ़ इंडिया(बानी) के संयोजक गोपाल कृष्ण बताते हैं, "यह कैंसर कारक है, दुनिया के तमाम देशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है पर यह जानते हुए भी कि यह इतना हानिकारक है, भारत सरकार इसके आयात को रोक नहीं रही है." गोपाल कृष्ण मानते हैं कि इसके पीछे की वजह दशकों से देश की सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी और सरकारी विभागों में समझ व तालमेल का अभाव है. उन्होंने बताया, "केंद्र सरकार के स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षणों से यह साफ़ पता चलता है कि यह काफ़ी हानिकारक पदार्थ है पर केंद्र सरकार के दूसरे विभाग इसे बढ़ावा देने में लगे हैं. पर्यावरण विभाग इसके समर्थन में है तो खनन विभाग इसपर लगा प्रतिबंध हटाने की पैरवी कर रहा है." ध्यान देने लायक तथ्य यह भी है कि जहाँ वर्तमान सरकार के श्रम मंत्री चंद्रशेखर राव ख़ुद कई एसबेस्टस खदानों के मालिक हैं, वहीं सोनिया गांधी के निर्वाचन क्षेत्र, रायबरेली में लोकसभा में कांग्रेस पार्टी के उपनेता डी वेंकटस्वामी एसबेस्टस का कारखाना लगा रहे हैं. ऐसे में एसबेस्टस पर छिड़ी बहस में आम लोगों और ख़ासकर एसबेस्टस में सांस लेते मजदूरों के स्वास्थ्य का सवाल अभी भी अपने सही उत्तर की प्रतीक्षा में है. चिंता यह है कि कहीं यह इंतज़ार उनकी ज़िंदगी से लंबा न हो. | इससे जुड़ी ख़बरें 'ज़हरीले जहाज़' पर ग्रीनपीस का अनुरोध25 अप्रैल, 2005 | विज्ञान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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