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अधिवेशन और भाजपा में असमंजस! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी भले ही कह रही हो कि पार्टी के कार्यकर्ता पाँच दिन के रजत जयंती अधिवेशन से नया संदेश और उत्साह लेकर जा रहे हैं लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे दूर दिखाई देती है. सच के ज़्यादा क़रीब की बात यह है कि नेता और कार्यकर्ता जिस असमंजस के साथ मुंबई पहुंचे थे वह पाँच दिन में बढ़ा भले न हो लेकिन कम भी नहीं हुआ है. जो सवाल उनके मन में थे वे मुंबई से लौटते हुए भी यथावत ही हैं. उल्टे अटल बिहारी वाजपेयी की सत्ता की राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा और संजय जोशी के इस्तीफ़े ने उन्हें नए सवाल दे दिए हैं. पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ते हुए लालकृष्ण आडवाणी जिन 25 हफ़्तों के कष्ट का ज़िक्र बार-बार कर रहे हैं दरअसल वह उनकी अकेले की पीड़ा नहीं है, पूरी पार्टी की पीड़ा है. भले ही इसे भाजपा सार्वजनिक रुप से स्वीकार न करे लेकिन इस कष्ट की जड़ें 2004 के लोकसभा परिणामों में भी है. यदि उस चुनाव में भाजपा गठबंधन की हार न हुई होती और केंद्र की सत्ता उनके हाथों से फिसली न होती शायद पार्टी की कलह शुरु ही न हुई होती. यदि हार न हुई होती तो वेंकैया नायडू के नेतृत्व पर सवाल नहीं उठते क्योंकि तब वो सभी लोग जिन्हें एकाएक नेतृत्व की याद आई वो उस वक्त सरकार का सुख भोग रहे होते. बहरहाल पाँच दिनों के अधिवेशन में पार्टी ने ऐसे किसी भी सवाल पर कोई सार्थक बहस नहीं की जिससे उसके संकट का समाधान हो पाता. नेतृत्व का संकट
पार्टी में सबसे बड़ा संकट है नेतृत्व का. अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी ओर से सत्ता की राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी है. संगठन के लिए वो कभी बहुत काम के नेता कभी थे नहीं. इसका अर्थ है कि उन्होंने ख़ुद किनारा कर लिया है. लालकृष्ण आडवाणी में ग़ज़ब की सांगठनिक क्षमता है और वे अब भी संकेत दे रहे हैं कि उनमें बहुत दमख़म है. लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका पुनर्वास संभव नहीं है और उन्हें जाना ही होगा. अब प्रमोद महाजन भले ही कहें कि अटल-आडवाणी के पीछे नेताओं की एक नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है लेकिन यह किससे छिपा है कि सबके सब इन बरगदों से लिपटी लताएँ हैं. प्रमोद महाजन भी जानते हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पार्टी के पाँचों मुख्यमंत्रियों में से ऐसा एक भी नहीं है जिसके नेतृत्व को राज्य में ही चुनौती न मिल रही हो. अपने जनाधार के साथ उमा भारती में नेता बनने की क्षमता थी. लेकिन उस उमा भारती को पार्टी की आपसी खींचतान और उनके अपने खिलंदड़ेपन और अहंकार भाव ने मैदान से ही बाहर कर दिया है. अटल बिहारी वाजपेयी ने आडवाणी को राम और उनके साथ प्रमोद महाजन को लक्ष्मण करार दिया है लेकिन इससे पार्टी के भीतर युवा नेताओं के बीच जो खींचतान थी वह थमने की बजाय तेज़ ही होने वाली है. राजनाथ सिंह भले ही अध्यक्ष बनने जा रहे हैं लेकिन पिछले पाँच दिनों में उनके हावभाव ने ज़ाहिर कर दिया कि वे अपनी क़ाबिलियत से नहीं समझौते के तहत इस पद पर बैठने जा रहे हैं. राजनाथ सिंह भी समस्या का कोई स्थाई हल नहीं हैं. भ्रष्टाचार
आडवाणी ने जब कहा कि भ्रष्टाचार की जड़ें कांग्रेसी संस्कृति में हैं तब वे साथ में यह स्वीकार भी कर रहे थे कि प्रश्न के बदले पैसा लेने के मामले में सबसे ज़्यादा भाजपा सांसद फँसे हैं और इससे पार्टी शर्मिंदा है. जब वे कह रहे थे कि पार्टी शर्मिंदा है तब कई कार्यकर्ताओं, विशेषकर सांसदों के मन में सवाल था कि एक शर्मिंदा पार्टी लोकसभा से वॉकआउट किस तरह कर सकती है. इसी अधिवेशन में ऐसे ही एक भ्रष्ट सांसद के बारे में एक प्रदेश के संगठन महामंत्री का बयान था कि ‘उनके बारे में पहले से कौन नहीं जानता था?’ इस सवाल का जवाब हालांकि संगठन महामंत्री के पास भी नहीं था कि अगर वे जानते थे तो संघ के निर्देशों के मुताबिक़ उन्होंने पार्टी के एक सांसद को गर्त में जाने से रोका क्यों नहीं. दरअसल इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है क्योंकि पार्टी के कार्पोरेटर से लेकर सांसद तक सभी एक दूसरे के बारे में ऐसी सच्चाई से वाकिफ़ हैं. वो साहूकार बने हुए हैं क्योंकि उन्हें चोरी करते हुए किसी ने अब तक नहीं पकड़ा है. और जो संजय जोशी पकड़े गए हैं वो किस तरह दूसरी पीढ़ी के नेताओं के बीच चल रही खींचतान के शिकार हुए हैं ये वो भी जानते हैं, पार्टी भी जानती है. और यह मानना ग़लत होगा कि संघ नहीं जानता होगा. जिस पार्टी के बड़े बड़े नेता पत्रकारों से ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत करने और टेलीविज़न के स्क्रीन पर दिखाई देने का लोभ संवरण नहीं कर पाते, उस पार्टी के छोटे कार्यकर्ताओं और नेताओं को लालकृष्ण आडवाणी कि ये नसीहत कितनी जँचेगी पता नहीं कि मीडिया से दूर रहना चाहिए. सिद्धांत का सवाल
पार्टी के सामने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर रखा है, वो है पार्टी के सिद्धांतों का. लालकृष्ण आडवाणी ने भले ही अपने समापन भाषण में कहा हो कि पार्टी सिद्धांतों से भटकी नहीं है. लेकिन पार्टी का हर कार्यकर्ता जानता है कि संघ जब सिद्धांतो की बात कहती है तो इसका अर्थ क्या होता है. लेकिन पार्टी यह भी जानती है कि जिस सिद्धांतों की बात संघ कर रहा है वह व्यावहारिक राजनीति का रास्ता नहीं है. सत्ता का आसान रास्ता नहीं है. कल्याण सिंह ने कोशिश भी कि थी कि पार्टी हिंदुत्व से लेकर राम मंदिर और राजनीति के अपराधीकरण जैसे सैद्धांतिक मुद्दों की ओर लौटे. लेकिन राजनीतिक प्रस्तावों में उनके मुद्दों की जिस तरह अनदेखी की गई उसने ज़ाहिर कर दिया कि पार्टी की प्राथमिकता फिलहाल गठबंधन की राजनीति है. ज़ाहिर है कि हिंदुत्व और राम की तुलना में गठबंधन की राजनीति सत्ता पाने का ज़्यादा सुलभ रास्ता है. वेंकैया नायडू जैसे नेता भले आश्वासन दे दें कि पार्टी अपने मुद्दों पर क़ायम है लेकिन उन्हें याद दिलाना पड़ता है कि गठबंधन का अपना एक धर्म होता है. कुल मिलाकर स्थिति ये दिखती है कि रजत जयंती मनाती पार्टी के सामने अभी कई यक्ष प्रश्न हैं जिसका जवाब इस वक्त किसी के पास नहीं है. शायद समय के पास इसका जवाब हो और सभी को उसका इंतज़ार रहेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें वाजपेयी के भाषण बिना ही अधिवेशन ख़त्म30 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'पार्टी विचारधारा पर क़ायम है'30 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'सत्ता की राजनीति' नहीं करेंगे वाजपेयी29 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस अधिवेशन में कई चीज़ें अलग सी हैं28 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस जोशी का आडवाणी पर दबाव से इनकार27 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'संघ के कारण है भाजपा'26 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस भाजपा का रजत जयंती अधिवेशन शुरू26 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस बिखर सकता है भाजपा का राष्ट्रीय स्वरूप24 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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