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गया की बहादुर गुड़िया लंदन पहुँची | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गया से गुड़िया लंदन आई, तो इसमें ऐसी बड़ी बात क्या है? बड़ी बात ये है कि बिहार के गया ज़िले के जिन लोगों के बीच से वो आई है, उनमें से शायद ही किसी को पता हो कि ये लंदन है क्या बला, अगर ये शहर है, तो है कितनी दूर..जाते हैं तो कैसे, रेलगाड़ी से या हवाई जहाज़ से? गुड़िया ख़ातून नाम है उस 13 साल की बच्ची का जो भारत भर के उन बच्चों की आँखें बनकर आई है जिनकी आँखें लंदन तो दूर, पटना और दिल्ली का भी सपना नहीं देख सकतीं. और ऐसा इसलिए क्योंकि वे कटे हुए हैं, समाज की मुख्यधारा से; छिपे हुए हैं, आधुनिकता की चमक-दमक से दूर किसी ऐसी अँधेरी दुनिया में जहाँ सपने भी आते हैं तो दिखती हैं - दो रोटियाँ - थोड़े कपड़े - कोई कच्चा घर. मज़दूर माता-पिता के छह बच्चों में से सबसे बड़ी गुड़िया ख़ातून ने उसी अँधेरी दुनिया से निकलने की कोशिश की, और ना केवल स्वयं निकली, बल्कि दूसरों को भी उजाला दिखाया. उसकी इसी क़ाबिलियत को, संघर्ष की अदम्य इच्छाशक्ति को, बच्चों के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ ने पहचान दी है और उसे लंदन बुलाया. यूनिसेफ़ ने बुधवार 14 दिसंबर को लंदन में "वर्ष 2006 में दुनिया के बच्चों की स्थिति पर रिपोर्ट" जारी की और इस समारोह में गुड़िया भी मौजूद थी, साहस का प्रतीक बनकर. गया में संघर्ष भरा जीवन गया के करमाडी गाँव में मोहम्मद सलीम अंसारी के जिस परिवार में गुड़िया का जन्म हुआ, वह परिवार गाँव के दूसरे लोगों की ही तरह किसी तरह जीविका चलाया करता था.
हालात ख़राब थे और इसी बीच सलीम अंसारी एक दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गए. ऐसे में घर की बड़ी बेटी गुड़िया ने अपनी माँ का हाथ बँटाना शुरू किया, नौ साल की उम्र से गुड़िया दूसरों के खेत-खलिहानों में मज़दूरी करने लगी. ज़िंदगी ख़ुरदुरी सतह पर हिचकोले खा रही थी लेकिन ऐसे में भी गुड़िया ने अपने एक स्वप्न को जीवित रखा - कि उसे पढ़ना है. वह दो साल तक मदरसे में गई लेकिन वहाँ के लिए 50 रूपए की फ़ीस जुटाना भी उसके लिए मुश्किल था. ऐसे में एक दिन उसकी मुलाक़ात हुई 'महिला सामाख्या केंद्र' की एक स्वयंसेविका से जो बिहार में शिक्षा के प्रसार के लिए बनाई गई संस्थाओं में से एक है और यूनिसेफ़ के साथ मिलकर काम करती है. गुड़िया को पता चला कि केंद्र की ओर से चलाए जाने वाले स्कूल में निःशुल्क शिक्षा दी जाती है, बस फिर क्या था उसने इरादा कर लिया आगे क़दम बढ़ाने का. गया से लंदन तक वैसे तो घर में माँ ने कहा कि काम ज़रूरी है, पढ़ाई नहीं. लेकिन गुड़िया ने अपनी माँ को समझा ही लिया.
गुड़िया कहती है, "अम्मी बोली कि पढ़ोगी तो घर का काम कौन करेगा, फिर हमारे यहाँ पर्दा भी है, लेकिन मैंने कहा कि मैं सारा काम कर स्कूल जाऊँगी और लौटकर भी काम करूँगी, और पढ़ाई से तो हमारी पीढ़ी बनेगी." गुड़िया दो साल पहले तक लगभग निरक्षर थी, लेकिन उसने कड़ी मेहनत की, विशेष कोर्स में नौ महीने के अंदर पाँच साल की पढ़ाई पूरी की और अभी सातवीं कक्षा में पढ़ रही है, जिसके लिए उसे हर दिन नौ किलोमीटर चलना पड़ता है. इसी बीच यूनिसेफ़ ने ऐसी किसी प्रतिभा की खोज शुरू की जिसने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी न केवल स्वयं राह खोजी बल्कि दूसरों को भी राह दिखाई. गुड़िया अपने घर पर अपने भाई-बहनों के अलावा कुल मिलाकर परिवार के 13 बच्चों को पढ़ाती है. साथ ही उसकी देखा-देखी और लोगों ने भी अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू किया. यूनिसेफ़ ने पहले अपनी खोज के लिए प्रदेशों में से बिहार का चुनाव किया, फिर आठ केंद्रों में से 300 से अधिक बच्चों को छाँटा गया और अंततः गुड़िया लंदन में उन बच्चों का प्रतिनिधित्व करने पहुँची जिन्होंने ज़िंदगी से लड़ाई की है. गुड़िया को लंदन लेकर आए यूनिसेफ़ के मीडिया प्रभारी अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं,"गुड़िया एक लड़की है, मुस्लिम समाज से आती है, ग़रीब है, उसका स्कूल घर से दूर है...हम ये बताना चाहते हैं कि गुड़िया जैसे बच्चे हैं लेकिन अधिक नहीं हैं, बहुत सारे ऐसे बच्चे हैं जो हिम्मत हार जाते हैं, उनपर ध्यान देने की आवश्यकता है". गुड़िया का सपना
लंदन में बीबीसी के दफ़्तर पहुँची, आत्मविश्वास से भरी हुई गुड़िया बताती है कि वह कराटे सीखना चाहती है और कराटे टीचर बनना चाहती है. वह कहती है,"लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, लेकिन कुछ बात हो जाए तो वह डर जाती है कि कहीं कोई मार-पीट ना करने लगे, लेकिन कराटे सीखकर हम अपने हाथ को हथियार बना सकते हैं". वैसे गुड़िया ये भी कहती है कि वह आगे और पढ़ेगी तो हो सकता है कि वो और भी कुछ सपना देखने लगे. चलते-चलते जब हमने यूँ ही भारत की एक रोल मॉडल - गुड़िया ख़ातून - से पूछा कि क्या वह भारत की ही एक और रोल मॉडल - सानिया मिर्ज़ा - को जानती हैं? गुड़िया ने कहा, हाँ अख़बार में पढ़ा है, फोटो भी देखा है. टीवी पर नहीं देखा, पूछने पर गुड़िया कहती है,"टीवी कहाँ, हम तो मिट्टी के तेल से जलनेवाली ढिबरी में पढ़ाई करते हैं!" गुड़िया के घर पर जलनेवाली मिट्टी के उस तेल की ढिबरी से निकली लौ अभी भारत भर को रोशन कर रही है, उसकी चमक लंदन भी पहुँच चुकी है. |
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