|
सरहद पर प्यास बुझाता साझा कुआँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित कश्मीर में भले ही अब प्राकृतिक विपदा के समय नियंत्रण रेखा को खोलने का फैसला किया गया हो लेकिन एक गाँव ऐसा भी है जहाँ पांच दशकों बाद भी विभाजन का कोई असर नहीं है. यह गाँव है पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले का सरदारपाड़ा. राजधानी कोलकाता से लगभग छह सौ किलोमीटर दूर सरदारपाड़ा गांव में देश का विभाजन पाँच दशकों बाद भी कोई असर नहीं डाल सका है. इस गाँव में विभाजन के पत्थर तो जरूर लगे हैं लेकिन दिलों में कोई विभाजन नहीं हो सका है. गांव में एक कुआँ ठीक विभाजन रेखा पर स्थित है, इसका आधा हिस्सा भारत में है और आधा बांग्लादेश में. भारत और बांग्लादेश, दोनों के नागरिक इसी कुएँ का पानी पीते हैं. इस गाँव का आधा हिस्सा जलपाईगुड़ी जिले में है तो आधा बांग्लादेश के तेंतुलिया थाना इलाके में. मुस्लिम बहुल इस गाँव को शांति का द्वीप कहा जा सकता है. गाँव के 75 वर्षीय मेहरुल आलम कहते हैं कि "हमने दिल से अब तक राजनीतिक तौर पर हुए विभाजन को कबूल नहीं किया है." आलम कहते हैं कि "गाँव के 55 परिवारों ने पत्थर के कुछ खंभों को अब तक विभाजन रेखा नहीं माना है. हम सुख-दुख में यहाँ एक-दूसरे की सहायता करते रहे हैं." वे बताते हैं कि "इस गांव में अपराध का नामोनिशान तक नहीं है." ख़ुद ही प्रहरी बांग्लादेश के पचागढ़ कालेज के छात्र मोहम्मद प्लावन का कहना है कि "हम गाँव में आपराधिक गतिविधियों को सहन नहीं कर सकते." वे बताते हैं कि "भारत के सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) और बांग्लादेश राइफल्स (बीडीआर) के जवान कभी इस गांव में नहीं आते."
गांव की एक महिला फरजाना बीबी सवाल करती है कि "आप यहाँ क्यों आए हैं? हम यहाँ बाहरी लोगों को नहीं आने देते. इसकी वजह यह है कि वे लोग हमें बांटने का प्रयास करते हैं." वे सवाल करती है कि "वर्ष 1940 से जिस गाँव में दोनों ओर के लोग एक ही कुएँ का पानी पीते है. आप उसे बांट कैसे सकते हैं?" सुरक्षा बलों का रवैया कैसा है? इस सवाल पर मोहम्मद आलम का कहना है कि "वे अपना काम करते हैं. लेकिन उनसे हमें कोई परेशानी नहीं है. हम सरदारपाड़ा में अपराधियों को नहीं बसने देते. आप बीएसएफ या बीडीआर से इस बात की पुष्टि कर सकते हैं." सरदारपाड़ा के बांग्लादेशी हिस्से में रहने वाले रहीम चाचा बताते है कि वे लोग चीनी, नमक और कपड़ों के लिए भारत पर निर्भर हैं. बांग्लादेश में इन वस्तुओं की कीमत बहुत ज्यादा है. इस गांव के लोग इलाज के लिए सिलीगुड़ी के पास उत्तर बंगाल मेडिकल कालेज अस्पताल को ही तरजीह देते हैं क्योंकि बांग्लादेश का नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यहाँ से 15 किमी दूर है. लेकिन दूसरी ओर, गांव के भारतीय नागरिक अपनी रोजमर्रा की जरूररतों के लिए पागलीरहाट (बांग्लादेश) के बाजार पर निर्भर हैं. मोहम्मद आलम का कहना है कि विभाजन के पांच दशकों के दौरान किसी भी नागरिक ने कानूनों का उल्लंघन नहीं किया है. दोनों देशों के नागरिक ही यहाँ सीमा प्रहरी की भूमिका निभाते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें चरमपंथी हमले में 13 जवानों की मौत28 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस बांग्लादेश पर सहयोग न करने का आरोप08 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस 'बांग्लादेश में अल क़ायदा सक्रिय'29 नवंबर, 2003 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||