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रविवार, 25 सितंबर, 2005 को 10:05 GMT तक के समाचार
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पैसों की एक खुली सी मंडी...

काबुल का मुद्रा बाज़ार
काबुल में मुद्रा का यह बाज़ार भीड़ भरे बाज़ार का एक हिस्सा होता है
जब मैं अफ़ग़ानिस्तान जा रहा था तब एक मित्र ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा था कि एक डॉलर देकर अगर चाय पी ली और बदले में अगर अफ़ग़ानी मुद्रा लेनी पड़ी तो पैसे हाथों में नहीं समाएँगे.

हालांकि ऐसी स्थिति आई नहीं क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान में नए युग के साथ मुद्रा भी बदल गई है लेकिन लोगों ने बताया कि जैसे ही तालेबान सरकार का पतन हुआ तब मुद्रा का अवमूल्यन इतना हो चुका था कि दस-दस हज़ार के नोट चला करते थे और उससे भी कुछ ठीक-ठाक ख़रीद पाना संभव नहीं था.

नया अफ़ग़ानी मुद्रा का मूल्य भारतीय रुपयों की तुलना में कुछ ही कम है. एक अमरीकी डॉलर की क़ीमत भारतीय रुपए में 43 रुपए है तो अफ़ग़ानी में 50 के आसपास.

आमतौर पर रुपयों और अंतरराष्ट्रीय नोटों की तुलना में अफ़ग़ानी का आकार बहुत छोटा है. जर्मनी और कनाडा के सहयोग से छपे इन नोटों का रंग हालांकि अच्छा ही लगता है आश्चर्यजनक नहीं.

आश्चर्यजनक तो लगता है काबुल और दूसरे शहरों में मुद्रा की खुली मंडी देखकर. मैंने मुद्रा की ऐसी खुली मंडी नहीं देखी थी.

एक तो हर बाज़ार में सड़कों के किनारे लड़के हाथों में तरह-तरह की करेंसी लिए हुए दिख जाते हैं. अगर आपको डॉलर के बदले अफ़ग़ानी चाहिए (जिसे आमतौर पर आफ़्स कहा जाता है) या डॉलर के छोटे नोट चाहिए तो अपनी टैक्सी में बैठे-बैठे ही यह हो सकता है.

अफ़ग़ानी मुद्रा की वास्तविक क़ीमत बहुत कम रह गई है

यहाँ तक तो ठीक था लेकिन जब मैं बाज़ार पहुँचा तो यह देखकर चकित रह गया कि सड़के किनारे लोग पटरी लगाए बैठे थे जो मुद्रा बाज़ार ही था.

यहाँ आपको डॉलर और अफ़ग़ानी में मुद्रा परिवर्तन की सुविधा तो है ही आप चाहें तो पाकिस्तानी मुद्रा में भी अदला-बदली कर सकते हैं.

तालेबान के समय की मुद्रा भी उपलब्ध है लेकिन वह सिर्फ़ संग्रहकर्ताओं के लिए ही है क्योंकि उसका मूल्य अब कुछ बचा नहीं. मैंने दस नए अफ़ग़ानी देकर 11000 मूल्य के पुराने अफ़ग़ानी नोट ख़रीदे.

तीन दशक तक लगातार युद्ध की विभीषिका झेल चुके अफ़ग़ानिस्तान में बेरोज़गारी दूर करने का एक साधन यह भी है.

जैसा कि मुद्रा के इस छुट्टे व्यवसाय में लगे रसूल ने कहा, "दिन अच्छा हो तो एक दिन में ढाई-तीन सौ भी बन जाते हैं वरना पचास से भी काम चलाना पड़ता है."

भारत से अफ़ग़ानिस्तान के संबंध बेहद दोस्ताना हैं लेकिन भारतीय मुद्रा वहाँ कोई स्वीकार नहीं करता अलबत्ता पाकिस्तानी रुपए कोई भी ले लेता है.

भारतीय नोट स्वीकार न किए जाने से निराश हुआ ही जा रहा था कि वापसी के लिए एयरपोर्ट पहुँचा और यह देखकर कुछ तसल्ली हुई कि दुकानदार चिप्स और पानी की बोतल के लिए भारतीय रुपए स्वीकार कर रहा था.

एक ही कंपनी की गाड़ियाँ

काबुल में अफ़ग़ानिस्तान के दूसरे शहरों में भी सड़कों पर आमतौर पर (अपवादों को छोड़कर) सिर्फ़ एक ही कंपनी की गाड़ियाँ दिखाई देती हैं.

जापान की कंपनी टोयोटा की. लंबी लंबी कारें या फिर बड़ी फ़ोर व्हील ड्राइव वाली एसयूवी (स्पोर्ट्स यूटीलिटी व्हीकल). अगर आपको याद हो तो तालेबान के लड़ाकों की पसंदीदा गाड़ी भी टोयोटा की पिकप्स होती थीं.

काबुल
कई कारें तो बीस साल से भी ज़्यादा पुरानी हैं

इस पर तो एक टेलीविज़न चैनल ने बाक़ायदा कार्यक्रम बनाया था कि उन्हें यही गाड़ियाँ क्यों पसंद आती थीं और इनकी क्या ख़ासियतें थीं.

वैसे काबुल की सड़कें चौड़ी हैं लेकिन फिर भी यह समझ में नहीं आता कि हर कोई एक ही कंपनी की लंबी-लंबी कारें क्यों चला रहा है. चाहे वो टैक्सी हो या फिर निजी कारें.

मज़ेदार बात यह है कि ज़्यादातर लोगों को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं है कि उनकी गाड़ी कितना एवरेज दे रही है यानी एक लीटर पेट्रोल या डीज़ल में वे कितने किलोमीटर दौड़ रही हैं.

पूछताछ से पता चला कि ये गाड़ियाँ मुख्यरुप से सऊदी अरब से आई हुई हैं और कुछ पाकिस्तान से भी. और इनमें से ज़्यादातर बेहद पुरानी हैं. कई कारें तो बीस-बीस साल पुरानी हैं.

लेकिन वे मज़े से चल रही हैं.

अब तो टोयोटा ने बाक़ायदा सर्विस स्टेशन भी खोल रखा है और स्पेयर पार्ट्स भी बेच रही है. नई गाड़ियों का शो रुम भी है सो जो नई गाड़ियाँ ख़रीदी जा रही हैं उनमें से भी ज़्यादातर टोयोटा ही हैं.

खुले बाज़ार और प्रतिस्पर्धा के इस ज़माने में अभी भी अफ़ग़ानिस्तान का बाज़ार उतना खुल नहीं पाया है. हो सकता है कि आने वाले दिनों में कुछ बदले और भारतीय सड़कों की तरह वहाँ की सड़कों पर भी छोटी और किफ़ायती कारें दिखाई देने लगें.

हालांकि परिवर्तन के तौर पर काबुल की सड़कों पर चलने वाली सार्वजनिक परिवहन वाली बसें टाटा कंपनी की हैं क्योंकि उन्हें भारत सरकार ने भेंट के तौर पर वहाँ भेजा है.

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