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उत्तर प्रदेश में चार और कुलपति बर्ख़ास्त | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल टी राजेश्वर राव ने कड़ा कदम उठाते हुए चार और विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को बर्खास्त कर दिया. राज भवन की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि राज्यपाल ने कुलपतियों के खिलाफ़ कार्रवाई की सूचना मुख्यमंत्री को भेज दी है. विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार राज्यपाल पदेन विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होते हैं. इस नाते वे विश्वविद्यालयों के प्रशासन में सर्वोच्च पदाधिकारी हैं. राजभवन द्दारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार सेवा से बर्ख़ास्त चार कुलपति हैं- रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जेडएच जैदी, पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के प्रो. नरेश चन्द्र गौतम, चन्द्रशेखर आज़ाद कृषि विश्वविद्यालय कानपुर के डॉ. पीके सिंह और मेरठ कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ पीपी सिंह. प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार प्रशासनिक जाँच में चारों विश्वविद्यालयों के कुलपति वित्तीय अनियमितताओं और गैरकानूनी रूप से देश भर में दूरस्थ शिक्षा केन्द्र संचालित करने के दोषी पाये गये हैं. डिग्री बाँटने की दुकानें प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दूरस्थ शिक्षा केन्द्रों के हजारों छात्रों से बड़े पैमाने पर जो धन वसूला जाता था उसमें विश्वविद्यालयों के कुलपति भी हिस्सा लेते थे. वस्तुत: ये केन्द्र, एमसीए, एमटेक, बीपीटी यहाँ तक की एलएलएम और एमफिल बाँटने की दुकानें थीं. यह दुकानें या केन्द्र लगभग हर राज्य में थी और ऐसे 677 केन्द्र थे. इन केन्द्रों को चलाने में दिल्ली, मुम्बई और इलाहाबाद के कुछ बिचौलिए शामिल थे. एक तिहाई से आधा धन बिचौलिए स्वंय लेते थे और शेष धन राशि शिक्षा केन्द्रों और विश्वविद्यालयों के बीच बंटती थी. इस अवैध कार्य व्यापार से हजारों की संख्या में छात्र प्रभावित हुए जिनको डिग्री के नाम पर छपे हुए कागज़ का टुकड़ा पकड़ा दिया जाता था. इससे पहले बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी के कुलपति प्रो. रमेश चन्द्र और मेरठ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आरपी सिंह को बर्खास्त कर दिया गया था. विश्वविद्यालयों के प्रशासन में वित्तीय अनियमित्ता, भ्रष्टाचार और पक्षपात की शिकायतें लम्बे समय से हैं लेकिन इससे पहले इतनी कड़ी कार्यवाई किसी गवर्नर ने नहीं की थी. वर्तमान राज्यपाल टी. राजेश्वर राव पहले एक पुलिस अफसर थे और दक्षिण भारत से आये हैं. समझा जाता है कि इस कारण कुलपतिगण उन तक जुगाड़ नहीं बैठा पाये. |
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