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मस्तिष्क ज्वर से 200 लोग मारे गए | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर प्रदेश में इंसेफ़्लाइटिस यानि मस्तिष्क ज्वर से 200 लोगों के मारे जाने की ख़बर है. ये बीमारी अकसर मानसून में फैलती है. अधिकारियों ने आशंका जताई है कि मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती है क्योंकि ग्रामीण इलाक़ों में मारे गए लोगों के बारे में कई बार पता नहीं चलता है. डॉक्टरों ने कहा है कि बच्चे इस बीमारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं जिसमें छह महीनों से लेकर 15 साल तक के बच्चे शामिल हैं. 1978 से लेकर अब तक इसके चलते भारत में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं. अगर एक बार ये बीमारी हो जाए तो इसका इलाज नहीं किया जा सकता लेकिन माना जा रहा है कि दुनिया में तीन ऐसे टीके उपलब्ध हैं जिनके इस्तेमाल से इस बीमारी को रोका जा सकता है. विवाद बीबीसी संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी का कहना है कि उत्तर प्रदेश में अब तक कोई भी राज्य सरकार इस बीमारी के लिए कारगर टीकाकरण कार्यक्रम नहीं बना पाई है. लखनऊ में संजय गाँधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट में काम कर रहे डॉक्टर टी एन ढोल ने बताया कि ज़्यादातर पीड़ित ग़रीब तबक़े हैं और ग्रामीण इलाक़े से हैं. उनका कहना है कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुंसधान परिषद यानि आईसीएमआर ने उस टीके का परीक्षण करने का अनुमोदन नहीं किया है जो चीन इस्तेमाल कर रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि आईसीएमआर अपनी प्रयोगशाला में एक मंहगा टीका बनाता है और अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए ही वो परीक्षण की अनुमति नहीं दे रहा. जब बीबीसी ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुंसधान परिषद से संपर्क करने की कोशिश तो बात करने के लिए वहाँ कोई भी उपलब्ध नहीं था. भारत के पूर्वी इलाक़ो में 1978 के बाद से ही मस्तिष्क ज्वर बार बार होता रहा है. |
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