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नेपाल में भी दिमाग़ी बुख़ार का क़हर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में दिमाग़ी बुख़ार या जापानी इंसेफ़्लाइटिस से मरने वाले लोगों की संख्या 200 हो गई है. भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के पूर्वी हिस्से में फैली इस बीमारी ने पहले ही सैकड़ों लोगों की जानें ली हैं. यह इलाक़ा नेपाल के दक्षिण-पश्चिमी सीमावर्ती हिस्से से लगा है बीमारी अब नेपाल में भी पैर पसार रही है. नेपाली अधिकारियों का कहना है कि पिछले दो महीनों में हज़ारों लोग इस बीमारी से प्रभावित हुए हैं और मरने वालों की संख्या कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि दूर-दूराज़ क्षेत्रों में होने वाले मौतों का पता तक नहीं चल पाता. स्वास्थ्य कर्मचारियों का कहना है कि मृतकों की उतनी ही ज्ञात संख्या होती है जिनकी मौत सरकारी अस्पताल में होती है, घर में या किसी अन्य स्थान पर मरने वाले व्यक्ति की गिनती इसमें शामिल नहीं होती. मच्छरों और सुअरों के ज़रिए फैलने वाली यह बीमारी सबसे अधिक बच्चों को प्रभावित करती है इसलिए भारत और नेपाल, दोनों देशों में मरने वाले सबसे अधिक बच्चे ही हैं. इसका एक ख़तरनाक पहलू यह भी है कि इस बीमारी की चपेट में आने वाला व्यक्ति अगर ठीक भी हो जाए तो उसके विकलांग होने की काफ़ी अधिक आशंका होती है. नेपाली अधिकारियों का कहना है कि दवाइयों और मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने स्वीकार किया है कि समय पर दवाएँ नहीं पहुँचने के कारण मौतें भी हुई हैं. नेपाल के स्वास्थ्य मंत्री एन शमशेर राना ने कहा है कि देश में टीकों की कमी है और वे चीन से इसे मँगाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्होंने भी मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका प्रकट की है. बीमारी से निबटने में नाकामी के लिए नेपाल की सरकार की आलोचना भी हो रही है और कहा जा रहा है कि टीके की कमी के लिए सरकारी नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं. |
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