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गोहाना का आँखों देखा हाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गोहाना की बाल्मीकि बस्ती में कई सारी चीज़ें एक साथ जलने की दुर्गंध के बीच लोग अपना सामान खोजते हैं, पर हाथ सिर्फ़ राख लगती है. एक के बाद एक जितने भी घरों में हम गए हालत एक सी थी. भरी दोपहर, शहर के बीचों-बीच 50 से ज़्यादा मकान फूंक दिए गए. प्रशासन और पूरा शहर ख़ामोशी से देखता रहा. कृष्णा का मकान पहली ही गली में घुसते ही सामने दिखता है. उनकी दो जवान बेटियाँ हैं उनमें से एक की शादी का सामान उन्होंने जुटाया था, जो उनके सामने राख का ढेर बना पड़ा है. कृष्णा कहती हैं, “बेटी की शादी के लिए मैंने कुछ ज़ेवर बनवाए थे और कुछ नए कपड़े लिए थे. वो सब कुछ तो अपने साथ ले गए, और बाक़ी सब जला दिया गया है. यहाँ तक कि खाने के लिए एक दाना तक नहीं बचा.” इसी तरह रोशनी ने बड़ी मेहनत से अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, ज़िंदगी भर की कमाई से कुछ महीने पहले ही पक्का मकान बनाया, एक बेटे की शादी की, लेकिन उसके आज हर कमरे में राख के ढेर हैं. उसके आंसू रोके नहीं रुकते. उसका दुख सिर्फ़ इतना नहीं की उनका सब कुछ जल गया, “ हम लोग डर की वजह से घर छोड़कर चले गए थे. लेकिन उन्होंने फिर भी मेरे घर को जला दिया और अफ़सोस की बात यह है कि जिन लोगों ने मेरा घर जलाया मैं ज़िंदगी भर मैंने उनकी और उनके माँ-बाप की सेवा की है फिर भी मुझ विधवा पर उन्होंने तरस नहीं खाया.” पुलिस के सामने बर्बरता की ये घटना अचानक हुई ऐसा नहीं है. इस इलाके के 12 गाँवों की बिरादरी पंचायत जिसमें सिर्फ़ ऊँची जाति के लोग शामिल हैं, 48 घंटे पहले, अल्टीमेटम देकर इस कृत्य को अंज़ाम दिया. प्रशासन को इस बात का अहसास था. लेकिन किसी बड़े हादसे की आशंका से निपटने के लिए पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने दलित बस्ती की सुरक्षा बढ़ाने की बजाए, दलितों को बस्ती छोड़कर कुछ दिन बाहर रहने की हिदायत दी. एक प्रत्यक्षदर्शी सोहन लाल का कहना था कि पुलिस की उपस्थिति में सब कुछ हुआ. वे बताते हैं, “पुलिस सुबह छह बजे आई थी उन्होंने तमाम दलितों को बस्ती छोड़कर चले जाने को कहा और जब दोपहर को हमारे घरों में आग लगाई गई तब न सिर्फ़ पुलिस बल वहाँ मौज़ूद था बल्कि आला अफसर पर भी घटना स्थल के पास थे.” आख़िर प्रशासन ने बात इतनी क्यों बढ़ने दी. हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने दिल्ली में इसकी सफ़ाई में कहा, “प्रशासन को आशंका थी और इस मसले को सुलझाने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन इसी बीच कुछ शरारती तत्वों ने पाँच दलितों के घरों में आग लगा दी जो बाकी घरों में भी फैल गई.” गोहाना में हुई ये घटना जहाँ क़ानून व्यवस्था का मसला है, वहीं सामाजिक ढाँचे से जुड़ा बड़ा सवाल भी है. गोहाना की घटना से पहले दलितों पर अत्याचार के अनेकों मामले सामने आते रहे हैं. इनमें से हरियाणा की अगर बात करें तो दशहरे के दिन पाँच दलितों की हत्या, पलवल में दलितों का बहिष्कार और अब ये गोहाना की घटना और कितनी ही ऐसी घटनाएं हैं जो रिपोर्ट हो ही नहीं पातीं. किसी भी घटना के लिए दोषी किसी व्यक्ति को आज तक सज़ा नहीं हुई है. असल में इस तरह की घटनाओं के पीछे जो स्वयंभू पंचायतें हैं, उनके प्रभाव के सामने क़ानून हमेशा झुकता रहा है, क्योंकि 58 साल के बाद भी सत्ता और सामंतवाद का गठजोड़ आज भी काफ़ी मज़बूत है. नहीं तो क्या कारण है कि आर्थिक सुधारों के नगाड़े पीटने वाले सामाजिक सुधार की बात भी ख़ास मौकों पर ही करते रहे हैं? |
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