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गुरुवार, 28 जुलाई, 2005 को 13:21 GMT तक के समाचार
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कभी नहीं भूलेगी वह बरसात की एक रात

मुंबई की बारिश
छाते से सिर का तो बचाव है पर बाक़ी..?
मुंबई में आम तौर पर बारिश से जनजीवन पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. सो 26 जुलाई को दोपहर बाद करीब दो बजे मैं बारिश के बावजूद घर से निकल पड़ा.

जाना था जूहू स्थित इस्कॉन मंदिर के पास एक दफ्तर में जहां अभिनेता जिमी शेरगिल मेरा इंतज़ार कर रहे थे. अपनी कार से दफ्तर के भीतर पहुंचने में अपने जूते और कपड़ों को बारिश से बचा कर मैं काफी ख़ुश था. लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि इस 26 जुलाई को तो इतिहास में दर्ज होना है.

उस दफ्तर के भीतर जिस कमरे में मैं जिमी के साथ बैठा वहां से बाहर कुछ नहीं दिखता था. लगभग पौन घंटे बाद हमें लगा कि बाहर से आ रही बारिश की आवाज़ तेज़ हो रही है. जिमी ने कहा- चलिए ज़रा बाहर मज़ा लेते हैं.

लेकिन बाहर तो कुछ और ही नज़ारा था. उफ.....क्या बारिश थी....लग रहा था कि हम किसी बांध के नीचे खड़े हैं और ऊपर बांध के गेट खोल दिए गए हैं. उस बंगले के गेट के बिल्कुल सामने खड़ी मेरी कार के टायर पूरी तरह पानी के नीचे चले गए थे.

मुंबई की बारिश
सड़कों पर यातायात पूरी तरह ठप्प है

कार बमुश्कल पंद्रह गज़ दूर होगी पर उसे देखने के लिए आंखों पर काफी ज़ोर देना पड़ रहा था. मुझे अपनी कार की चिंता सता रही थी, कहीं स्टार्ट न हुई तो घर कैसे जाउंगा. उस वक्त इससे ज़्यादा बुरी स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती थी.

दफ्तर में मौजूद करीब बीस लोगों के चेहरों पर चिंता की लकीरें गहरी हो रहीं थीं और आंखे लगातार बाहर टिकी थी. दिलीपकुमार साहब के सेक्रेट्री रहे जॉन चेरियन लगातार टहल रहे थे और बाहर सड़क पर बढ़ते पानी की थाह लेने को उतावले थे.

शाम के लगभग पांच बजे बिजली गुल हो गयी. दफ्तर में मोमबत्तियां तक नहीं थी. लाज़िमी भी है – मुंबई में भला कभी ज़रूरत भी पड़ती है.

तब तक लगभग सभी मोबाइल नेटवर्क बारिश में बह गए थे. लेकिन कुछ सामान्य लैंडलाइन फोन काम कर रहे थे. मुंबई के बाहर से मोबाइल पर भी एकाध कॉल आ रही थी. लोगों ने जल्दी जल्दी अपने घरों पर बताना शुरु किया कि वे सुरक्षित हैं.

दूसरी तरफ से जो पता चला उसका सार ये कि बिजली सारे शहर में गुल है, ज्यादातर इलाकों में घुटने से कमर तक पानी है और केवल पिछले चार पांच घंटों में सात आठ लोग जान गंवा चुके हैं. भारत की व्यवसायिक राजधानी, देश की सबसे आधुनिक, सबसे धनी नगरी कही जाने वाली मुंबई असहाय हो चुकी थी.

रात नौ बजे दोमंजिले बंगले में मौजूद उस दफ्तर के ग्राउंड फ्लोर में पानी घुस आया. हम लोगों के पास पहली मंज़िल पर जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था. रात गहरा रही थी, चारो ओर घुप अंधेरा और बारिश का ऐसा शोर कि बात करने के लिए सुर ऊंचा करना ही पड़ता. इस बीच गोरखा कर्मचारी ने पता नहीं कहां से दाल रोटी का इंतज़ाम कर ही लिया.

रात काटनी मुश्किल थी. सब आड़े तिरछे जहां तहां लेटने का जुगाड़ कर रहे थे. एक केबिन मेरे और जिमी के हिस्से आ गया. हम देर तक बात करते रहे पर टांगे सीधी करने की अदम्य इच्छा ने हमें फर्श पर ला दिया. कमरे में पड़ी कांच की मेज़ के एक तरफ नंगी फर्श पर जिमी शेरगिल सीधे हो गए और दूसरी तरफ मैं.

रात जैसे तैसे कटी. हर कोई सुबह के इंतज़ार में था. पौ फटते ही कुछ लोग निकल लिए कमर तक पानी में. ये देख हमारी भी हिम्मत बंधी. मैने जिमी से कहा- चलो. जॉन साहब ने फौरन ज़ोर मारा – हां हां निकलते हैं.

पर जिमी शेरगिल ठहरे हीरो- पानी में उतरने से उनका संकोच साफ दिख रहा था. तभी सामने वाले बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड ने एक रास्ता बताया जावेद अख्तर के घर की तरफ से. वहां शायद कम पानी हो. हमने एक आठ फूट ऊंचा गेट फांदा और चल पड़े उधर. लेकिन उस सड़क पर किसी भी तरफ जाएं करीब पचास मीटर बाद वही आलम, घुटने भर पानी से शुरुआत. आखिर हम पृथ्वी थियेटर के आगे पानी में उतर पड़े.

इस सुबह का सभी इंतज़ार कर रहे थे. दफ्तरों में रुके लोग, रास्तों में अटके लोग, स्कूलों में रोते बच्चे, अपनों की तलाश में निकले लोग. लेकिन हर किसी को वहां पहुंचना था जहां अपने थे. और ये सही समय था क्योंकि बारिश बंद नहीं हुई थी थोड़ी धीमी जरूर हुई थी और जहां गले तक पानी था वहां सीने तक आ गया था.

मुंबई की बारिश
दफ़्तर से घर लौटना आसान नहीं है

अमिताभ बच्चन के बंगले जलसा के गेट खुले थे. अंदर पानी भरा दिख रहा था. सामने घुटने भर पानी में हज़ारों लोगों का हुजूम धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था. सड़क पर गाड़ियां भी थी और लोग भी पर गाड़ियां खड़ीं थीं और लोग चल रहे थे.उनके पास पहिए नहीं पैर थे. भीगता हुआ ये हुजूम सड़क पर खड़ी आधी डूबी कारों, बसों, ट्रकों और आटोरिक्शाओं के बीच रास्ता बनाता बढता जा रहा था.

यहां स्कूल में रात गुज़ार कर लौट रहे छोटे छोटे बच्चे भी थे तो किसी अपने या पराये के ही कंधों का सहारा लेकर बढ़ती बूढ़ी औरतें भी. लोगों के भीगे कपड़े बता रहे थे कि झोपड़पट्टी में रहने वाले लोग भी उसी शांति से आगे बढ़ रहे हैं जिस शांति से लैपटॉप बैग थामे या डिज़ाइनर कपड़े पहने या मर्सिडीज़ या लेक्सस गाड़ियों में चलने वाले लोग.

इन सड़कों पर ऑटोरिक्शा भी उतने ही शांत खड़े थे जितनी शांत शानदार लैंडक्रूज़र. लोगों के चेहरों पर थकान तो थी पर डर या चिंता नहीं. मेरे साथ एक नामी चेहरा था इसलिए मुझए ये अनुभव भी साक्षात हुआ कि किसी नामी गिरामी चेहरे को देखकर लोग लगभग वैसे ही आवाज़ें लगा रहे थे जैसे आमतौर पर करते.

बच्चों के चेहरे पर पापा के साथ घर जाने की खुशी थी तो पापा के चेहरे पर बच्चों को सकुशल पाने का संतोष. कहीं घुटने भर तो कहीं कमर तक पानी में उतराते चलते लोग बतियाते हुए आगे बढ़ रहे थे. कोई किसी को न भी जानता हो तो क्या उस वक्त तो सब एक ही सफर पर थे, सफर की थकान भी तो कम होती है, दर्द भी तो कम होता है. कोई परेल से रात भर चलता आ रहा था तो कोई कल शाम ठाणे से अपनी बेटी को अंधेरी स्थित ससुराल से लेने निकला था और आधे शहर का चक्कर लगाता आ रहा था.

कुछ लोगों ने पूरी रात अपनी कारों के ऊपर ही बैठ कर बितायी थी. ऐसे लोगों के लिए आसपास के जोशीले जवान पता नहीं कहां कहां से बिस्कुट, ब्रेड स्लाइस और मूंगफली ला रहे थे. कोई चलते चलते अपने पॉलीथीन बैग से पानी निकालता तो बगल से गुजर रहे शख्स से भी दो घूट के लिए पूछ लेता. तो सामने से आ रहे लोग बिना पूछे ही बताते जा रहे थए कि अंधेरी एसवी रोड पर ट्रैफिक खुल गया है. और इंडियन ऑयल चौराहे पर दूध मिल रहा है.

सड़क पर फैले इस समंदर में चलते हुए मुझे जहां एक तरफ सरकारी व्यवस्था पर ग़ुस्सा आ रहा था जो पूरी तरह नदारद थी तो वहीं लोगों का व्यवहार और हिम्मत देखकर ये समझ भी आ रहा था कि ये शहर दूसरों से अलग क्यों है. असल में हर हाल में हिम्मत न हारना ही इस शहर की खासियत है. हिम्मत मैने भी नहीं हारी और करीब चार घंटे बाद 10 किलोमीटर का पैदल सफर तय कर घर पहुंचकर ही दम लिया. मुझे इस शहर में आए आखिर तीन साल हो रहे हैं.

66मुंबई में बारिश का क़हर
रिकॉर्ड तोड़ बारिश ने मुंबई में जनजीवन अस्तव्यस्त करके रख दिया.
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