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रविवार, 17 जुलाई, 2005 को 11:32 GMT तक के समाचार
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धर्मांतरण के आरोप पर हंगामा

बाबूलाल गौर और उमा भारती
उमा भारती के शासन काल में झाबुआ में घटना घटी थी
मध्यप्रदेश में सरकार द्वारा नियुक्त एक जाँच समिति की रिपोर्ट को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है.

एक विवाद यह है कि समिति की रिपोर्ट मीडिया को कैसे मिली और दूसरी धर्मांतरण को लेकर की गई टिप्पणियों को लेकर.

इस समिति की रिपोर्ट को राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने चुनौती दी है.

दरअसल यह समिति उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले में हुए हिंदू-ईसाई धार्मिक हिंसा की जाँच के लिए नरेंद्र प्रसाद समिति गठित की गई थी.

लेकिन नरेंद्र प्रसाद समिति ने घटना से जुड़े सवालों के उत्तर की बजाय नए विवादों पर चर्चा शुरू करवा दी है.

यह विवाद शुरु हुआ है जाँच प्रतिवेदन के विवादास्पद पहलुओं को चुनिंदा तौर पर उजागर करने वाले प्रेस विज्ञप्ति से जो कथित रुप से शासन ने ख़ुद ही भोपाल से प्रकाशित लगभग सभी समाचारपत्रों को भिजवाई.

मई में शासन को सौंपी गई नरेंद्र प्रसाद समिति की रिपोर्ट 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के बाद विदेशी संस्थाओं की मदद के प्रस्तावों को धर्मांतरण से जोड़कर देखती है जो इस रिपोर्ट के अनुसार झाबुआ की धार्मिक हिंसाओं का मुख्य कारण थी.

राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने रिपोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए और प्रेस को रिपोर्ट लीक होने पर राज्य सरकार को चिट्ठी भेजी है.

ईसाई मिशनरियों की सेवा का मुख्य लक्ष्य धर्मांतरण को ठहराते हुए रिपोर्ट कहती है, "दो और तीन दिसंबर 1984 की मध्यरात्रि में जो विषैली गैस यूनियन कारवाईड फैक्ट्री से रिसी थी उससे प्रभावित भोपालवासियों के उपचार हेतु कुछ विदेशी संस्थाओं की आतुरता का उल्लेख करना आवश्यक समझा जाता है.”

इतना ही नहीं समिति के अनुसार प्रतिष्ठित एरीजोना यूनिवर्सिटी भी ईसाइयत के प्रचार का साधन है.

 अगर कोई विश्व प्रसिद्ध एरीज़ोना विश्वविद्यालय को ईसाइयत से जोड़कर देखे तो यह उसकी मानसिकता का परिचायक है
इंदिरा अयंगर

इस संदर्भ में समिति इस अमरीकी विश्वविद्यालय द्वारा भोपाल में शुरू लेकिन बाद में बंद कर दिए गए ट्रेनिंग सेंटर का भी ज़िक्र करती है.

संस्था से जोड़कर ज़िक्र किया गया है राज्य अल्पसंख्यक आयोग की ईसाई सदस्य इंदिरा अयंगर को भी.

लेकिन इंदिरा अयंगर कहती है, "अगर कोई विश्व प्रसिद्ध एरीज़ोना विश्वविद्यालय को ईसाइयत से जोड़कर देखे तो यह उसकी मानसिकता का परिचायक है."

उनकी शिकायत यह भी है कि अगर समिति ने उन पर कुछ आरोप लगाए थे तो कम से कम उनसे एक बार उनका पक्ष भी लिया जाना चाहिए था जो नहीं लिया गया.

रिपोर्ट

मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक नरेंद्र प्रसाद इन सवालों के जवाब में सिर्फ़ इतना ही कहते हैं कि पूरी रिपोर्ट अधिकृत शासकीय पत्रों के ऊपर आधारित है और इसमें सुनी-सुनाई बातें या उनके विचार सम्माहित नहीं.

 झाबुआ ज़िले में जो भी आपराधिक एवं हिंसात्मक घटनाएं अब तक घटी हैं उनमें से अधिकांश में किसी न किसी रूप में धर्मांतरण का पुट रहा है
रिपोर्ट का हिस्सा

यह बात अलग है कि 2003-2004 झाबुआ ईसाई-हिंदू हिंसा के दौरान शासकीय व्यवस्था और कारवाईयों पर काफी सवाल उठे थे.

हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि धर्म परिवर्तन के लिए अपनाए जाने वाले तरीक़े इस समिति द्वारा की जा रही जाँच के लिए प्रासंगिक नहीं है, किंतु पूरी जाँच रिपोर्ट झाबुआ के दंगों का कारण धर्मांतरण ही बताती हैं.

एक सौ पन्नों की इस रिपोर्ट की शुरुआत ही धर्मांतरण की बात से होती है. “झाबुआ ज़िले में जो भी आपराधिक एवं हिंसात्मक घटनाएं अब तक घटी हैं उनमें से अधिकांश में किसी न किसी रूप में धर्मांतरण का पुट रहा है.”

यही बात रिपोर्ट लगभग अपने हर पन्ने में बार-बार दुहराती है.

दिसंबर और जनवरी माह में हुई इन घटनाओं को मध्यप्रदेश अल्पसंख्यक आयोग ने ईसाई धार्मिक स्थलों की तोड़-फोड़ और उसके धर्म गुरुओं तथा कुछ मुस्लिम परिवारों पर हुई हिंसा से जोड़कर देखा था और इन सभी घटनाओं को सुनियोजित भी करार दिया था.

सवाल

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के गुरुबचन सिंह ने भी अपने पत्र में भारतीय जनता पार्टी विधायक नागर सिंह चौहान, झाबुआ पुलिस अधीक्षक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी संस्था सेवा भारती के ख़िलाफ़ कारवाई की बात कही थी.

चिट्ठी में धार्मिक गुरु आसाराम बाबू की शिष्या कृष्णा बेन के ख़िलाफ़ आदिवासियों और ईसाइयों तथा हिंदू-ईसाई के मध्य कलह पैदा करने के लिए कारवाई की सिफारिश थी.

कृष्णा बेन पर ईसाइयों द्वारा चलाई जाने वाली एक संस्था में घुसकर तोड़फोड़ का आरोप था.

लेकिन नरेंद्र प्रसाद रिपोर्ट इन मामलों पर प्रशासन द्वारा की गई या नहीं की गई कारवाईयों का कोई ज़िक्र नहीं करती. हाँ, पुलिस और प्रशासन पर वह ज़रूर लगाती है.

आंकड़ों का ज़िक्र

नरेंद्र प्रसाद ने ज़िले में बड़ी संख्या में धर्मांतरण को सिद्ध करने के लिए जनगणना आयोग का भी हवाला दिया है और कहा है कि झाबुआ में ईसाइयों की संख्या कुल आबादी का 1.96 प्रतिशत है.

1991 में झाबुआ में कुल आबादी के मुकाबले ईसाई आबादी का प्रतिशत 1.32 प्रतिशत था.

राज्य में इस समय क़रीब एक लाख सात हज़ार के आसपास ईसाई हैं. जबकि मध्यप्रदेश की कुल जनसंख्या करीब 6 करोड़ 34 लाख है.

1961 के बाद हुई प्रत्येक जनगणना में ईसाइयों की आबादी मध्यप्रदेश में कुल जनसंख्या के अनुपात में कम होती आई है. 1991 में यह 0.64 प्रतिशत थी.

नरेन्द्र प्रसाद झाबुआ में ईसाइयों की बढ़ती जनसंख्या का दोष ज़िलाधीशों को देते हैं कि उन्होंने धर्मांतरणों की सूचना सरकार को नहीं दी.

मध्यप्रदेश में मौजूद धर्म स्वातंत्रय नियम 1969 के अनुसार धर्म परिर्वतन करने वाले व्यक्ति को इसकी सूचना ज़िला प्रशासन को देनी चाहिए. रिपोर्ट के अनुसार ज़िला प्रशासन ने राज्य शासन को ऐसी सूचनाएँ पिछले 35 साल से दी ही नहीं.

लेकिन राज्य में दो बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही है और धर्मांतरण पार्टी के लिए हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है.

विज्ञप्ति

इस एक सदस्यीय समिति की रिपोर्ट में जनगणना के हवाले का सहारा लेते हुए भोपाल में पिछले सप्ताह एक दो पेज की विज्ञप्ति करीब-करीब सारे स्थानीय अखबारों को जारी हुई.

जो कहा जा रहा है शासन ने ख़ुद उन्हें भिजवाई.

 मेरे विभाग के पास न तो नरेंद्र प्रसाद समिति की रिपोर्ट आई है न जनसंपर्क विभाग ने ऐसी कोई विज्ञप्ति जारी की है
ओपी रावत, जनसंपर्क प्रमुख

विज्ञप्ति में झाबुआ में ईसाई जनसंख्या पिछले 10 सालों में 80 प्रतिशत बढ़ी हुई बताई गई. इसमें राज्य सरकार द्वारा धर्मांतरण क़ानून में बदलाव की भी बात थी.

लेकिन मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव और जनसंपर्क प्रमुख ओपी रावत कहते हैं, "मेरे विभाग के पास न तो नरेंद्र प्रसाद समिति की रिपोर्ट आई है न जनसंपर्क विभाग ने ऐसी कोई विज्ञप्ति जारी की है."

लेकिन भोपाल में सवाल किए जा रहे हैं कि अगर शासन में यह सवाल किए जा रहे हैं कि अगर शासन ने यह प्रेस रिलीज़ स्वयं नहीं जारी की तो एक ही दिन एक ही तरह की यह विज्ञप्ति यहाँ के लगभग सारे अखबारों को कैसे मिली और दूसरे दिन लगभग सभी स्थानीय समाचार पत्रों में एक साथ छपी.

यह कहा जा रहा है कि अगर ऐसा है तो बाबूलाल गौर सरकार यह जाँच करवाएं कि ऐसा किसके द्वारा किया गया.

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