|
चंबल में अपहरण बन रहा है एक उद्योग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कभी अन्याय और अत्याचार के विरोध में शुरू हुई चम्बल की 'दस्यु परंपरा' अब एक उद्योग का रूप ले चुकी है. इसके अंतर्गत ग़ैरक़ानूनी धंधों को संरक्षण, राजनीतिज्ञों से साँठगाँठ और फिरौती के लिए अपहरण का फायदेमंद अपराध फल फूल रहा है. डाकुओं द्वारा किए जाने वाले अपहरण ने तो इस क्षेत्र में एक व्यवस्थित रूप ले लिया है. पुलिस अधिकारी आरएस भदौरिया का कहना है,“ अपहरण में कोई मशक्कत की ज़रूरत नहीं होती है. लोग खेत-खलिहान में अकेले मिल जाते हैं. फिर डकैत इन अपहरण के किए लोगों से पैसे वसूलते हैं.” पुलिस के आँकड़ों के अनुसार 2003 में चंबल क्षेत्र में डाकुओं ने 121 लोगों का अपहरण किया. सन् 2004 में यह संख्या 74 थी और इस वर्ष के शुरू के चार महीनों में ही यह 15 पहुंच गई है. पिछले 15 दिनों के भीतर ही भिंड और शिवपुरी में दो डाकू गिरोहों ने छह लोगों का अपहरण किया था. लेकिन अपहरण के वास्तविक आँकड़े इससे कहीं ज़्यादा हैं क्योंकि अक्सर मामलों में अपह्त व्यक्ति या उसके परिवार वाले नुक़सान के डर से पुलिस में केस ही दर्ज नहीं कराते. इसलिए डाकुओं के ख़िलाफ़ कोई केस नहीं बनता. हालाँकि ऐसा नहीं कि चंबल के डाकू पहले अपहरण नहीं करते थे. पुलिस के अनुसार 1958 से हीं चंबल में सक्रिए अमृत लाल ने अपहरण और फिरौती का सिलसिला शुरु कर दिया था. अपहरण का यह सिलसिला इसलिए शुरु हुआ क्योंकि गाँवों में रक्षा समितियों के पास बंदूकें आ जाने के कारण डाकुओं को डकैती डालने में गाँववालों का विरोध सहना पड़ता था. नया धंधा फिर डाकुओं को इसमें फायदा नज़र आया. 1965 से 70 के बीच सक्रिए डक़ैत सरदार नाथू सिंह ने तो दिल्ली के एक मूर्ति व्यापारी का बड़ी योजनाबद्ध तरीके से अपहरण किया था और तब उससे पाँच लाख की मोटी रकम वसूल की थी.
लेकिन अब डाकुओं द्वारा किए जाने वाले अपहरण का तरीका बदल गया है और इस पूरी प्रक्रिया में ज़्यादातर वह खुद शामिल ही नहीं होते. डाकू समस्या के उन्मूलन के लिए कई बुद्धिजीवी और समाजसेवी संस्थाएं चला रहे बुजुर्ग समाज सेवी परशुराम भदौरिया इस व्यवस्था का उल्लेख कुछ यूं करते हैं, “ डाकू पहले डाका डालने जाते थे. उसमें खतरा भी होता था. वे मारे भी जा सकते थे. अब डाकू नवयुवकों को कहते हैं कि तुम हमें पकड़ लाकर दो और 10 प्रतिशत नगद ले जाओ. ” लेकिन नवयुवकों का इस अपराध से जुड़ने का कारण सिर्फ़ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है. मध्यप्रदेश में डकैत विरोधी अभियान के प्रमुख अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एसएस शुक्ला कहते हैं,“ सबसे बड़ी दिक्कत सामाजिक और आर्थिक है, नवयुवक शिक्षित होते जा रहे हैं लेकिन उन्हें रोज़गार नहीं मिल रहा.” बड़ी फिरौती आसानी से देने की क्षमता रखने के कारण डाकुओं के अपहरण के शिकार अक्सर व्यापारी और उद्योगपति ही होते हैं. लेकिन ग़ैरक़ानूनी धंधे चलाने वाले इस समुदाय के लोगों से डाकुओं की सांठगांठ हो गई है. इस क्षेत्र में पत्थर की खदानें हैं और जो 'स्टोन किंग' हैं उनसे इनकी साँठगाँठ हो गई है. यह उनको पैसे देते हैं और डकैत इन ग़ैरक़ानूनी खदानों में मज़दूरी की व्यवस्था करते हैं. पठारी इलाकों वाले मध्य भारत के इस क्षेत्र में पत्थर पहाड़ों को तोड़कर या फिर ज़मीन खोदकर निकाला जाता है. काला संगमरमर के नाम से जाने जानेवाले इस पत्थर की माँग विदेशों में होने कारण यह धंधा भारी फ़ायदे का है. कहा जाता है कि इस समय चंबल में सक्रिए सबसे बड़े डकैत गड़रिया गिरोह ने अपने रिश्तेदारों की मदद से कई दूसरे धंधों में भी अपने पैसे लगाने शुरु कर दिए हैं. पैसे उगाहने की कला में माहिर इन डकैतों ने राजनीतिज्ञों से भी साँठगाँठ बनाई है.. जीवाजी विश्वविद्यालय में राजनीतिकशास्त्र विभाग के प्रमुख एपीएस चौहान कहते हैं,“ आपने 60 और 70 के दशक के पहले कभी नहीं सुना होगा कि डकैत राजनीति में हिस्सा ले रहे हैं. चुनाव प्रचार कर रहे हैं या बूथ पर कब्ज़ा कर रहे हैं. लेकिन अब ऐसा होता है और कई बार वे अपने रिश्तेदारों को चुनाव भी लड़वाते हैं.'' कहा जाता है कि राजनीतिज्ञों के साथ इस रिश्ते का फ़ायदा समय-समय पर पुलिस पर दबाव बनाने में भी काम आता है. और आत्मसमर्पण की सूरत में भविष्य में राजनीति में प्रवेश का एक रास्ता तो इससे खुलता ही है. इधर एक बार फिर दयाराम गड़रिया और कुछ बड़े गिरोहों के आत्मसमर्पण की बात चल रही है. अगर ऐसा हो गया तो शायद डाकू समस्या पर थोड़े दिनों के लिए विराम लग जाएगा. लेकिन “दस्यु परंपरा” के व्यवसायीकरण ने चंबल में इस अपराध का एक ऐसा व्यवस्थित तंत्र तैयार कर दिया है जो भविष्य में विकराल रूप ले सकता है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||