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जातिगत आधारों पर बंटे हैं चंबल के डकैत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चंबल के कुख़्यात ठाकुर दस्युओं के दिन पूरी तरह से भले ही न लदे हों, लेकिन भिंड, मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी और उत्तरप्रदेश के इटावा क्षेत्र के बीहड़ों में आजकल गूंज है गड़ेरिया, गूजर और जाटव गिरोहों की. मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा तैयार एक लघु शोध में जिन सात इनामी गिरोहों का ज़िक्र हैं वे हैं दयाराम गड़रिया गिरोह, निर्भय सिंह गूजर, रमेश जाटव और रघुवीर सिंह ढीमर गिरोह. दो इनामी डकैत हज़रत रावत और प्रताप गड़रिया हाल में ही मारे गए. उत्तरप्रदेश में पड़ने वाले चंबल क्षेत्र में सक्रिए डाकुओं की सूची में पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाले डाकुओं की संख्या ज़्यादा है. परबती, बेतवा, सोनार और चंबल जैसी नदियों के क्षेत्र में बसे इलाके में डाकू या बाग़ी कहा जाना अपमानजनक नहीं समझा जाता. शायद इसी कारण परिवार या आज के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न जातियाँ अपनी मौजूदगी इस तरह भी दर्ज कराती रही हैं. मध्यप्रदेश के डाकू विरोधी आपरेशन के प्रमुख एसएस शुक्ला कहते हैं, “जिस जाति से डाकू खड़े हो जाते हैं उल्टे उस समाज का समर्थन प्राप्त होने लगता है. जाति के लोग इसमें गर्व महसूस करते हैं और चाहते हैं कि उनकी सुरक्षा की जाए, उनकी मदद की जाए.” दस्युओं को जातिगत समर्थन हमेशा से प्राप्त रहा है, लेकिन पहले चूंकि ये गैंग बड़े होते थे इसीलिए इसमें अक्सर कई जातियों के लोगों का सम्मलित होना भी ज़रूरी हो जाता था. जैसे मुल्का पंडित के गैंग में ही गड़रिया जाति के कई लोग थे. लेकिन मुख्यतौर पर जातीय आधार के संघर्ष का किस्सा पहली बार 70 के दशक में नाथू जाटव द्वारा आगरा के गढ़वाढ़ में 10 राजपूतों की हत्या बताई जाती है. उसके बाद तो फूलन देवी ने बेहमई में ठाकुरों का नरसंहार या पिछले साल का भंवरपुरा कत्लेआम जातीय संघर्ष के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. ग्वालियर स्थित जीवाजी विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष एपीएस चौहान इन घटनाओं में बिहार और उत्तर प्रदेश में चल रहे जातीय संघर्ष की झलक देखते हैं. उनका कहना है, “अब अधिकतर डकैत गैंग चंबल के बुंदेलखंड में जातीय आधार पर बने होते हैं और वे किसी और प्रकार के संघर्ष का इस रूप में इज़हार करते हैं. भंवरपुरा कांड वगैरह इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.” राजनीति क्या मध्यप्रदेश की मुख्यतः दो दलीय राजनीतिक व्यवस्था इसकी खुली अभिव्यक्ति में बाधक है? और इसी कारण जातीय संघर्ष इस क्षेत्र में इस रूप में सामने आ रहा है?
समाजशास्त्री और चंबल की दस्यु समस्या पर शोध कर चुके पीयूएस तोमर कहते हैं, “कितना भी मित्रवत व्यवहार निचली और अगड़ी जाति में नज़र आए. लेकिन सत्य यह है कि सैकड़ों वर्षों की ऊँची जातियों द्वारा निचली जाति के लोगों के प्रति व्यवहार को लेकर उनमें में एक रोष है.” चंबल के क्षेत्र में एक समय बहुजन समाज पार्टी का ख़ासा प्रभाव बढ़ा था. लेकिन बाद में मध्यप्रदेश में बसपा का ही विभाजन हो गया. हालाँकि शोषित वर्ग को सम्मान देने की भारतीय प्रजातंत्र की असफलता इन वर्गों द्वारा अपनी पहचान बंदूक से बनाए जाने के कारण बताई जाती है. लेकिन फिर भी प्रजातंत्रीय व्यवस्था ने इन्हें आवाज़ देने में मदद की है. समाज सेवी राकेश दीक्षित का कहना है,“अब चूंकि उनकी संख्या अधिक है इसका आभास उन्हें हो गया है और उनमें जागृति तो आई ही है.” शायद यही कारण हो कि चंबल में पिछड़ी जाति के ये डकैत अब राजनीति में भी दखल की कोशिश कर रहे हैं. गड़रिया की बहन ख़ुद पंचायत चुनाव में उम्मीदवार थी और कहा जाता है कि हज़रत रावत ने अपने समाज के कई लोगों की चुनाव में मदद की थी. अब तो चंबल में छोटी जातियों के दस्युओं के बीच भी संघर्ष के उदाहरण सामने आ रहे हैं. पिछले लगभग सात वर्षो से डाकू विरोधी आपरेशन के सदस्य रहे ग्वालियर जिले के कटहिया थाने के प्रभारी आरएस भदोरिया कहते हैं,“ जब हज़रत रावत फरार हुआ तो उसने गड़रिया समाज के लोगों का अपहरण किया. लेकिन इसमें एक भी व्यक्ति उसकी अपनी जाति का नहीं था. ” अगड़ी जाति की चंबल में संख्या कम होने के कारण इन जातियों के शिक्षित बेरोज़गारों का दूसरे क्षेत्रों में पलायन भी कहा जाता है. हालाँकि इस पर कोई सही आँकड़ा फिलहाल उपलब्ध नहीं है. लेकिन चंबल में गड़रिया और जाटवों का उदय एक रूप में ही सही पिछ़ड़ी जातियों का अपनी पहचान के लिए अभिव्यक्ति माना जा रहा है. |
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