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आपातकाल की घोषणा की पृष्ठभूमि | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कांग्रेस संसदीय दल में अपने प्रतिद्वंद्वी मोरारजी देसाई को हराकर ही इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं. स्वतंत्र भारत में पहली बार इस पद के लिए मुक़ाबला हुआ. उन्हें तब तटीय भारत के स्थापित कांग्रेस नेताओं के समर्थन पर भरोसा करना पड़ा था और यह असामान्य सी हालत थी. 1967 में संसदीय आम चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा में बहुत ही मामूली बहुमत मिला. विपक्षी दलों ने उस चुनाव में गैर कांग्रेसवाद की रणनीति अपनाई थी और नौ राज्यों में विपक्षी दलों की संयुक्त सरकारें सत्ता में आ गईं. इसी आधार पर संसद में भी विपक्षी दलों ने आपसी तालमेल करके बहुत प्रभावकारी भूमिका निभाई. इंदिरा गाँधी को यह आशंका होनी स्वाभाविक थी कि मामूली सी गिनती के कांग्रेसी सांसदों के दलबदल से वे अपनी सत्ता को गंवा सकती हैं. ऐसे में ही उन्हें 1969 में राष्ट्रपति पद के चुनाव के अवसर पर, कांग्रेस पार्टी के अंदर एक और संघर्ष से गुज़रना पड़ा. कांग्रेस पार्टी विभाजित हो गई और वह लोकसभा में अल्पमत में आ गई. यह तो बिल्कुल असह्य स्थिति थी और इंदिरा गाँधी का पद असुरक्षित ही हो गया. विभाजन से जो समानांतर कांग्रेस पार्टी बनी उसके नेता हर क़ीमत पर प्रधानमंत्री को सत्ता से हटाकर राष्ट्रपति पद के चुनाव में अपनी हार का बदला लेना चाहते थे. तब प्रधानमंत्री ने भारत की राजनीति में ध्रुवीकरण का कौशल दिखाया. बदलाववादी भूमिका निभाते हुए उन्होंने जनता की उमंगें जगा दीं और ग़रीबी हटाओ के नारे से जो माहौल बना, वे उसे 1971 के संसदीय आम चुनाव में भारी बहुमत हासिल कर भी निभा सकती थीं. उन्हें उस चुनाव में अप्रत्याशित सफलता मिली. उसी वर्ष उन्हें दिसंबर में एक दूसरी कामयाबी मिली, जब भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हरा दिया और पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए. वे आम चुनाव में जननायक बनी थीं, अब राष्ट्रनायक की अपूर्व कीर्ति उन्हें मिली. असुरक्षा की भावना इस घटनाक्रम से जहाँ वे और उनके सहयोगी सत्ता पर अपने अधिकार को जन्मसिद्ध मानने लगे, वहीं असुरक्षा का वह तीव्र दंश जो 1966 से 1971 तक बार-बार लगा था, भुलाया नहीं जा सकता था. लेकिन इन दोनों बातों से कहीं ज़्यादा जनता की बहुत ऊँची उठी उमंगों को पूरी करने का भारी दबाव था. कांग्रेस पार्टी में युवा तुर्क भी उसे बढ़ा रहे थे और समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी. 1971 का आम चुनाव बहुत अधिक खर्चीला था और सत्ता पर बने रहने के लिए अपार धन इकट्ठा करने की मज़बूरी भी थी. ख़ासकर जब एक ओर, असुरक्षा का दंश याद रहता था और दूसरी ओर हर हालत में सत्ताधारी बनी रहने की तीव्र इच्छा थी. इसके चलते बदलाव की तरंगों का साथ कैसे दिया जा सकता था और सत्ता का दुरुपयोग करके भ्रष्टाचार विपुल धन संग्रह से कैसे बचा जा सकता था ? 1972 से संसद में पूरी बहस भ्रष्टाचार के मुद्दे को केंद्र बनाकर हुई. महँगाई भी बढ़ती जा रही थी. आर्थिक नियोजन से तो 1969 में ही तीन वर्ष की छुट्टी ले ली गई थी. असंतोष इंदिरा गाँधी ने सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के अंदर असंतोष और विरोध को ठिकाने लगाया. राज्य विधानसभाओं में कांग्रेस के नेता का चुनाव, लोकतांत्रिक रीति से होना बंद हो गया. इंदिरा गाँधी उसका नाम तय करने लगीं. पार्टी के अंदर लोकतंत्र के आधार पर संगठन के चुनाव बंद कर दिए गए, राज्य इकाइयों के अधिकारियों के नाम भी वे ही तय करती रहीं. पार्टी में पूरी सत्ता इंदिरा गाँधी के हाथों में सिमट गई. भ्रष्टाचार और महंगाई में बढ़ोत्तरी और बदलाव की नीतियों से पलायन के कारण जनता का प्रतिरोध बढ़ा. संसद से नया आंतरिक सुरक्षा अधिनियम “मीसा” मंज़ूर कराया गया, पार्टी में सर्वसत्ता बनाकर देश में नागरिक अधिकारों पर प्रहार किए जाने लगे. जनता के अरमान भी झुठलाए गए और चलाया गया तीव्र दमनचक्र. 1974 की रेल हड़ताल इस क्रूरता से रौंदी गई जैसे कि वह एक सामान्य औद्योगिक विवाद न हो, क्राँति या प्रतिक्राँति की साज़िश हो. सभी यथास्थितिवादी, अनुदार और प्रतिक्रियावादी शक्तियों से गहरी दोस्ती बनती ही थी. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों की उपेक्षा करके 1973 में ही कर दी गई थी. पाँच वर्ष में पासा ही पलट गया. इधर, गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन ने भ्रष्टाचारी सत्ता पर वार किया तो बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र युवा शक्ति उभरी. पश्चिम बंगाल में 1972 के राज्य विधानसभा चुनाव को कांग्रेस ने लोकतंत्र विरोधी दमन से जीता था. जब विपक्षी दलों ने जेपी की संपूर्णक्राँति के आंदोलन में भागीदारी के साथ-साथ एकीकरण का प्रयत्न किया तो जनता के तीव्र असंतोष को ठोस दिशा मिली. ऐसे में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया. संयुक्त विपक्ष ने उनके इस्तीफ़े की माँग की. असुरक्षा के बहुत कठोर दबाव और सत्ता में हर हालत में अधिकार की तीव्र इच्छा के चलते, उन्होंने आपात स्थिति लागू कर दी. विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया और निष्कंट रूप से राज करने लगीं. |
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