|
'उनमें संस्कृति के प्रति सहज सम्मान था' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उनकी शिक्षा शांति निकेतन में हुई थी. वे जिस परिवार और माहौल में पली-बढ़ी थीं, उसमें संस्कृति के प्रति आदर और सजगता थी. उनके पिता देश के प्रधानमंत्री थे लेकिन वे लेखक-बुद्धिजीवी भी थे और उनका बौद्धिक संपर्क और संवाद व्यापक था. यही कारण है कि इंदिरा गाँधी के मन में संस्कृति को लेकर सम्मान और चिंता के भाव लगभग स्वाभाविक थे. मैंने उन्हें रूबरू पहली बार अँधेरे में देखा था. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा रवीन्द्र भवन दिल्ली के अपने स्टूडियो-थिएटर में शायद बादल सरकार के बंगला नाटक 'एवम् इंद्रजीत' की एक प्रस्तुति थी. मैं उसे देखने गया था. छोटे थिएटर में मेरी बगल में एक सीट ख़ाली थी. नाटक शुरू होने के पहले बत्तियाँ गुल हुईं और तभी एक महिला चुपचाप आकर वहाँ बैठ गई. मंच पर ज़रा सा प्रकाश आते ही मैंने देखा कि वे इंदिरा गाँधी थीं. उस समय वे सूचना प्रसारण मंत्री थीं. विशेष रूप से नाट्यप्रदर्शनों और कला वीथिकाओं में अक्सर जाया करती थीं. उन्होंने शान्त भाव से, बिना कोई हलचल किए, पूरा नाटक देखा और फिर चली गईं. 1980 के दिसंबर में आपातकाल के बाद बनी जनता सरकार के पतन के बाद जब वे फिर से प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने घर पर लेखकों-कलाकारों की एक बैठक बुलाई. मैं उसमें भोपाल से आया. रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, अजित कुमार, बव कारंत, बंसी कौल आदि कई मित्र उस बैठक में मौजूद थे. हमें बताया गया था कि कुल पैंतालीस मिनट का समय होगा और संस्कृति संबंधी मुद्दों पर खुली बातचीत होगी. वह हुई, लेकिन डेढ़ घंटे चली. वे स्वयं कम बोलीं. अपने स्वाभाविक बातूनीपन की वजह से मैं काफी मुखर रहा. कई बातों के अलावा मैंने यह भी कहा कि संभवतः लोकतंत्र में 'मीडियॉक्रिटी' को परोसने की मजबूरी है लेकिन संस्कृति में उत्कृष्टता के लिए वैकल्पिक मंच होने चाहिए. मैं यह कहने की गुस्ताख़ी तक कर गया कि हमारी तीनों राष्ट्रीय अकादमियाँ 'मीडियाक्रिटी' के राष्ट्रीय मंच बनकर रह गए हैं. उनके बरअक़्स और ब्रिटेन की आर्ट्स कौंसिल की तरह एक परिषद होनी चाहिए जिसकी अध्यक्ष प्रधानमंत्री हों और जिसमें संस्कृति पर समग्रता में विचार हो. उस समय इंदिरा जी ने कुछ नहीं कहा. अगले दिन जब मैं भोपाल वापस पहुँचा तो प्रधानमंत्री कार्यालय से फ़ोन आया कि मैं प्रस्तावित परिषद की रूपरेखा बनाकर भेज दूँ. क़िस्सा-कोताह यह है कि राष्ट्रीय कला परिषद गठित हुई जिसमें सत्यजीत रे, रविशंकर आदि सदस्य थे. राजीव गांधी के काल में उसकी दो-एक बैठकें भी हुईं और फिर वह निष्क्रिय या समाप्त हो गई. संवेदनशीलता 1981 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित राष्ट्रीय पुरस्कार कालिदास सम्मान पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर और पंडित सेमनगुड़ी श्रीनिवास अय्यर को देने श्रीमती गाँधी भोपाल आयीं. उनके अन्य कार्यक्रमों की व्यस्तता के कारण इस आयोजन के लिए समय में कुछ कटौती करना ज़रूरी हो गया. दोनों मूर्धन्यों का 30-30 मिनटों का गायन भी रखा गया था. उसे कम कर 15-15 मिनटों का किया गया. फिर एक सरकारी हरकारे ने आकर उसे पूरी तरह से हटाने का निर्देश दिया.
जब श्रीमती गाँधी रवीन्द्र भवन पहुँची तो मैंने उनसे पूछा कि क्या गायन का कार्यक्रम नहीं रखना है. वे बोलीं कि नहीं, ऐसा करने से संगीतकारों को बुरा लगेगा. बहरहाल, गायन हुआ और वे उसे पूरा सुनकर ही गईं. उसी दौरान वे भूल से पंडित कुमार गंधर्व को अपने भाषण में आदरणीय जोशी जी कह गईं. उन्होंने जाते समय पीछे लौटकर कुमार जी के पास जाकर उनका 'नमस्कार कुमार गंधर्व जी' कहकर अभिवादन किया और अपनी भूल सुधार ली. फरवरी 1982 में वे भोपाल भवन के उदघाटन के लिए आ रही थीं. जगदीश स्वामीनाथन, बव कारंत और मैंने मिलकर उस अवसर पर भारत के सौ से अधिक कला, साहित्य, संस्कृति के मूर्धन्यों और फ्राँस से रंगकर्मी पीटर ब्रुक को आमंत्रित किया था. योजना यह थी कि ये सब लोग अनौपचारिक रूप से प्रधानमंत्री से भारत भवन में कुछ समय के लिए मिलेंगे भी. पता नहीं क्या हुआ कि उनका कार्यक्रम जब बनकर आया तो उसमें कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक संबोधित करने के बाद वे थोड़े समय के लिए ही भारत भवन आ पा रही थीं और उसमें उदघाटन समारोह के अलावा कलाकारों आदि से मिलने के लिए समय की कोई गुंजाइश नहीं थी. मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की मुश्किल यह थी कि अगर वे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की बैठक रद्द कराकर कलाकारों-बुद्धिजीवियों से भेंट रखवाने की कोशिश करते तो उसके प्रतिकूल राजनीतिक आशय निकाले जा सकते थे. बहरहाल, मैंने प्रधानमंत्री की सलाहकार, श्रीमती पुपुल जयकर से संपर्क किया और कुछ घंटों में कार्यक्रम में वाँछित फेरबदल हो गया. कार्यकर्ताओं की बैठक रद्द कर दी गई और श्रीमती गाँधी लगभग एक घंटा सृजन-समुदाय से मिलीं. यह देखना प्रीतिकार था कि वे अनेक लोगों को जानती थीं- मुल्कराज आनंद, कमला देवी चट्टोपाध्याय, शंधु मित्र, नारायण मेनन आदि. जब कमला देवी उनके नजदीक आने पर औरों की तरह अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुईं तो श्रीमती गाँधी ने उनसे न उठने का अनुरोध किया और उन्हें वापस बैठाने का जतन किया. भारत भवन से वे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने अपने उदघाटन भाषण में यह तक कह डाला कि भोपाल देश की सांस्कृतिक राजधानी बनता जा रहा है. बाद में भारत भवन को एक ट्रस्ट में बदलने का उन्होंने भरपूर समर्थन किया और भारत सरकार की ओर से एक करोड़ रूपए का आर्थिक अनुदान भी दिया, भारत सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा अपने एक से अधिक न्यासी नामज़द करने की शर्त को रद करते हुए अनेक विदेशी अतिथियों को वे भारत भवन के बारे में बताती और उन्हें भोपाल भेजती थीं. सदभावना हिंदी साहित्यकार जैनेंद्र कुमार पर एक बार एक बड़ा आयोजन करने का विचार था. जब न्यास के सामने यह प्रस्ताव रखा गया तो किसी ने उत्साहप्रद प्रतिक्रिया नहीं की. वह परिणामतः ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. एक दिन रात को काफ़ी देर गए दिल्ली से श्रीकांत वर्मा का फ़ोन आया. वे हमारे न्यासी थे और मित्र भी. उन्होंने कहा कि भारत भवन को जैनेंद्र जी को लेकर कुछ करना चाहिए. मेरे कुछ कुरेदने पर उन्होंने बताया कि श्रीमती गाँधी ऐसा चाहती हैं. श्रीकांत जी ने बताया कि मेरे यह कहने पर कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था श्रीमती गाँधी ने उनसे कहा था कि उससे क्या, वे बड़े लेखक हैं कि नहीं. मध्यप्रदेश चूँकि उस समय संस्कृति के क्षेत्र में सक्रियता से अग्रणी था, उसे लेकर बहुतों के मन में कई गिले-शिकवे होते रहते थे. उनमें कुछ राजनेता भी थे जो अर्जुन सिंह के विरूद्ध थे और उन्हें लगता था कि वे संस्कृति के कारण श्रीमती गाँधी के निकट आकर उनका समर्थन पा रहे हैं. ऐसों की मदद करने वाले कुछ लेखक-बन्धु थे. एक बार प्रधानमंत्री कार्यालय से एक शिकायत आई जिसमें कहा गया था कि मध्यप्रदेश का संस्कृति विभाग आपातकाल के दौरान हर दिन तीन कविताएँ लिखने वाले भवानीप्रसाद मिश्र को शिखर सम्मान देता है. श्रीमती गाँधी पर व्यंग्य-कविताएँ लिखने वाले कवि नागार्जुन की अपनी पत्रिकाओं में पूरे पृष्ठ की तस्वीरें छापता है, ऐसी पुस्तकें खरीदता है जिनमें श्रीमती गाँधी के विरुद्ध कविताएँ शामिल हैं आदि. अर्जुन सिंह ने मुझे बुलाकर कहा कि इसका संक्षेप में उत्तर इस आधार पर देना है कि हमने संस्कृति के क्षेत्र को राजनीति या विचारधारा से ऊपर रखने का निश्चय श्रीमती गाँधी के निर्देशन पर ही किया है और इसलिए सब कुछ उत्कृष्टता और सर्जनात्मकता के आधार पर ही किया जा रहा है. ऐसा पत्र गया और फिर कोई पूछताछ नहीं हुई. लोलिता का मामला बाद में हमें पता चला कि प्रसिद्ध रूसी लेखक नाबोकोव का बहुचर्चित उपन्यास 'लोलिता' कस्टम अधिकारियों ने अश्लीलता वगैरह के आरोपों की वजह से रोक लिया था. एक प्रति तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी को भेजी गई. उन्होंने उसे इंदिरा जी को पढ़ने दिया. वे एक रात में पढ़ गईं और उन्होंने आपत्तियों को निराधार ठहराया और उपन्यास की प्रतियाँ कस्टमवालों की कैद से मुक्त कर दी गईं. कहीं यह ख़बर भी पढ़ी थी कि न्यूयार्क में अपने प्रवास के दौरान वे आग्रह कर अमरीकी उपन्यासकार और बुद्धिजीवी सूसन सौनटैड से मिली थीं. वे लंदन के अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह में एक शाम अपनी सखी पुपुल जयकर के साथ बिना किसी निमंत्रण और सुरक्षा के कविता सुनने भी गई थीं. नेहरू, जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया स्वतंत्रता के बाद ऐसे राजनेता थे जो संस्कृति की कद्र करते थे और जिनका समकक्षेता के भाव से बुद्धिजीवियों और लेखकों से संवाद था. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||