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शनिवार, 30 अक्तूबर, 2004 को 14:23 GMT तक के समाचार
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विरोधाभासों से भरा एक व्यक्तित्व

इंदिरा गांधी
उनके व्यक्तित्व में कई जटिलताएँ थीं
बीस बरस पहले 31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी की हत्या ने एक ऐसे असाधारण नेता के जीवन का अंत कर दिया जिसका न केवल भारतीय राजनीति में दबदबा था बल्कि जिसे एक महापुरुष के रुप में भी देखा गया.

अटल बिहारी वाजपेयी ने उनकी तुलना देवी दुर्गा से की थी. बीके बरुआ ने उनके बारे में कहा था, ‘इंदिरा इज़ इंडिया’ यानी ‘इंदिरा ही भारत है’.

जिस तरह सम्राट अशोक के कार्य स्तंभों और स्तूपों में दर्ज हैं उसी तरह कांग्रेस की सरकार को विश्वास था कि इंदिरा गांधी के कार्य कालातीत हैं इसीलिए इंदिरा गांधी के कार्यकाल का एक दस्तावेज़ तैयार किया गया और उसे एक टाइम कैप्सूल में बंद कर दिया गया.

इसे लालकिले के पास ज़मीन में गड़ा दिया गया ताकि आने वाली पीढ़ी को इसके बारे में जानकारी मिल सके.

कई परतें

ऐतिहासिक दृष्टि से इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व कैसा था और इंदिरा गांधी के बिना भारत कैसा है, यह एक अहम सवाल है. समकालीन भारत के समीक्षकों और विश्लेषकों की नज़र से देखें तो इंदिरा गांधी के जीवन के कई अध्याय हैं और उनमें कई परतें हैं.

वे प्रधानमंत्री थीं और उनके निवास पर उनके अपने ही सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी और उनके निष्ठावान राजनीतिक सहायक असहाय से देखते रह गए.

इंदिरा गांधी अपने बेटों के साथ
उनके भीतर एक असहाय माँ थी

उनके बेटे राजीव गांधी जब अपने प्रशंसकों के बीच थे, तभी एक आत्मघाती हमलावर ने हमला किया और शक्तिशाली बम ने उनके चीथड़े उड़ा दिए. उनके एक और बेटे संजय गांधी की मौत एक वायुयान दुर्घटना में हुई जिसे वे ख़ुद उड़ा रहे थे. उनका शव दिल्ली के बाहरी हिस्से में एक नाले में मिला था. फ़िरोज़ गांधी के परिवार के साथ बुरा हुआ.

इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व एक जटिल व्यक्तित्व था. शायद एकाकी बचपन, अव्यवस्थित लालन-पालन और अस्त-व्यस्त शिक्षा इसके कारण रहे हों.

इसके बाद उनके भीतर एक पहेली सा व्यक्तित्व था जिसमें अपने पिता के प्रति समर्पित और उनका ध्यान रखने वाली एक बेटी थी, एक असफल पत्नी थी, एक असहाय माँ थी, एक सौम्य मेज़बान थी, एक सख़्त सास थी, एक स्नेहमयी दादी थी, एक समझदार सहयोगी थी और इन सबसे ऊपर एक परिष्कृत मस्तिष्क की मालकिन थी जिसके मन में तुच्छ ईर्ष्याएँ थीं.

उनका करिश्माई व्यक्तित्व एक ओर तो श्रद्धा पैदा करता था और उसी समय तीव्र घृणा भी जगाता था. उनके नाज़ुक और कमज़ोर शरीर के भीतर शासन करने की निर्मम इच्छा थी.

सत्ता पाने के रास्ते में उन्हें कोई भी बाधा मंज़ूर नहीं थी चाहे वह पार्टी के भीतर का मामला हो या फिर सरकार का. उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद, सबका उपयोग किया.

विरोधाभास

वे अद्वितीय देशभक्त और राष्ट्रवादी थीं. वे मातृभूमि के लिए अनादर को ज़रा भी बर्दाश्त नहीं कर सकती थीं.

उदाहरण के लिए 1971 में भारतीय समुद्र सीमा के पास आ पहुँचे अमरीका के सातवें जहाज़ी बेड़े की उपेक्षा करने का निर्णय लेने में उन्होंने एक क्षण भी नहीं गँवाया और पूर्वी पाकिस्तान में ऑपरेशन मुक्ति वाहिनी को जारी रखा और बांग्लादेश बनाकर उसे पूरा भी किया.

 इंदिरा गांधी का बचपन ऐसे माहौल में बीता जहाँ लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था थी फिर बालिग होने पर उन पर महात्मा गांधी और पंडित नेहरु का साया था लेकिन एक नेता की तरह वे बेहद अलोकतांत्रिक थीं और निरंकुश तानाशाह भी.

इंदिरा गांधी का बचपन ऐसे माहौल में बीता जहाँ लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था थी फिर बालिग होने पर उन पर महात्मा गांधी और पंडित नेहरु का साया था लेकिन एक नेता की तरह वे बेहद अलोकतांत्रिक थीं और निरंकुश तानाशाह भी.

उन्होंने अपने बीस सूत्रीय कार्यक्रम के ज़रिए लोकतंत्र का उपयोग करके ग़रीबी दूर करने की योजना बनाई लेकिन उन्होंने 18 महीनों तक लोकतांत्रिक संस्थाओं के सारे अधिकार स्थगित कर दिए और आपातकाल लगाए रखा.

यह सच है कि विनोबा भावे ने आपातकाल को ‘शांति पर्व’ का नाम दिया, यह भी सच है कि आपातकाल-विरोध की उत्पत्ति लालू प्रसाद यादव ने अनुशासन लाने के लिए आपातकाल और इंदिरा गांधी का स्वागत किया.

हालाँकि इस ‘शांति पर्व’ के ही दौरान भारतीय नौकरशाही ने, न्यायपालिका ने, राजनीतिक नेताओं ने और नेहरु-गांधी परिवार के क़रीबी लोगों ने अपनी ताक़त बढ़ाई, संपत्ति अर्जित की, कुनबापरस्ती को बढ़ावा दिया और आपातकाल की आड़ में भ्रष्टाचार का ‘राष्ट्रीयकरण’ किया.

आपातकाल के घिनौने रुप का विवरण शाह कमीशन के तीन खंडों की रिपोर्ट में है.

संक्षेप में कहें तो लगता है कि इन करोड़ों लोगों के भले के लिए न तो इंदिरा गांधी प्रजातांत्रिक संस्थाओं का उपयोग कर पाईं और न आपातकाल जैसे अलोकतांत्रिक साधन को अपने काबू में रख सकीं.

यह अपने आपमें बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था क्योंकि 1947 के बाद से राजसत्ता की ताक़त को उस तरह कोई नहीं समझ सका जैसा कि इंदिरा गांधी समझती थीं.

इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि भारत में पटेल और पंत जैसे कई पके हुए यथार्थवादी नेता थे लेकिन गांधीवादी सिंद्धांतों ने उनकी यथार्थवादिता को कम किया.

इंदिरा गांधी भारत के शीर्ष नेताओं में पहली थीं जिन्होंने अपने आपको यथार्थवादी परंपरा में ढाल लिया. वे अनैतिक-यथार्थवादी राजनीति करने की कला में पारंगत हो गई थीं. एक तरह से वे बुश की पूर्वावतार थीं. वे एशिया की पहली नेता थीं जिन्होंने गोपनीय ढंग से पाकिस्तान के ख़िलाफ़ ‘मुक्ति-वाहिनी’ के नाम से एक अघोषित युद्ध छेड़ा ताकि पूर्वी पाकिस्तान से लाखों की संख्या में आ रहे शरणार्थियों से भारत की सुरक्षा के ख़तरों को टाला जा सके. फिर उन्होंने पड़ोसी राज्य सिक्किम की चुनावी राजनीति में ऐसे जोड़तोड़ किए कि वह एक गोली दागे बिना ही भारत का हिस्सा बन गया.

आदर्शों की तिलांजलि

नेहरु
नेहरु की मौलिक नीतियों को इंदिरा गांधी ने ख़त्म ही कर दिया

इंदिरा गांधी ने भारत में लोकप्रियता की राजनीति की शुरुआत की. वे ही थी जिन्होंने भारतीय राजनीति में ‘आदर्शवाद’ को ख़त्म किया. उन्हें यह महसूस हुआ कि नेहरु के ज़माने में बनाई गई मौलिक नीतियाँ लाभकारी नहीं हैं और उन्होंने राजनीतिक आदर्शों को छोड़ दिया और परिणाम पाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया.

उदाहरण के लिए जब भूमि सुधार विफल रहा तो उन्होंने कृषि को बढ़ावा देने के लिए हरित क्रांति का सहारा लिया. जब नीतियों के आधार पर वोट जुटाना असंभव दिखने लगा तो उन्होंने ‘लोकलुभावन’ राजनीति को अपना लिया.

यह मानना पड़ेगा कि गाँवों में रहने वाले आम आदमी के लिए, विशेषकर महिलाओं के लिए इंदिरा गांधी एक महान नेता थीं लेकिन एक शहरों में बसने वाले भारत के लिए वे सत्ता की राजनीति की एक विवादास्पद नेता थीं.

महात्मा गांधी के बिना भारत ने अपने आपको अनाथ महसूस किया. नेहरु के बिना उसे लगा कि वह असहाय है. इंदिरा गांधी के बिना भारत सदमे में था, उदास था.

इंदिरा गांधी का शोरशराबे से भरा शासनकाल समकालीन भारतीय इतिहास में एक फुटनोट के अलावा कुछ नहीं है. उन्होंने समय की रेत पर अपने पैरों के कोई भी निशान नहीं छोड़े हैं. भारत तो उनके न होने का अफ़सोस भी नहीं करता.

दरअसल एक इंदिरा में बहुत सी इंदिरा थीं, आख़िर किस इंदिरा के लिए भारत शोक मनाए?

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