BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शनिवार, 25 जून, 2005 को 09:36 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'प्रधानमंत्रियों में सबसे मज़बूत थीं'

इंदिरा गाँधी
इंदिरा गाँधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लगाया
मुझे लगता है कि जिस समय इमरजेंसी लगी और जब हटी तब एक तरह की राय बनी हुई थी.

जो लोग आपातकाल के भुक्तभोगी हैं ये उनकी राय थी कि इन कारणों से आपातकाल लागू हुआ.

लेकिन इन तीस बरसों में कई ऐसी चीज़ सामने आई गई हैं जिससे इसमें कुछ चीज़ें नई जुड़ी हैं.

उस समय प्रधानमंत्री सचिवालय में काम करने वाले दो शीर्ष अधिकारियों ने आपातकाल के दिनों को लेकर अपने अपने ढंग से कुछ लिखा है.

एक तो बिशन टंडन की डायरी है जो वे उन दिनों हर रोज़ लिखा करते थे और दूसरा पीएन धर के संस्मरण हैं.

बिशन टंडन को पढ़ने के बाद लगता है कि इंदिरा गाँधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लगाया. तीस साल बाद पता चल गया है कि यदि 12 जून 1975 का इलाहाबाद कोर्ट का फ़ैसला नहीं आया होता तो आपातकाल नहीं लगता.

लेकिन पीएन धर ने दो और कारण आपातकाल लगाए जाने के बताए हैं. एक तो रेल हड़ताल और दूसरा बिहार का छात्र आंदोलन. इन दोनों के कारण इंदिरा गाँधी के लिए राज चलाना कठिन हो गया था.

ये तीन कारण आपातकाल के हमारे सामने आते हैं.

जब उन्होंने अपने नियमों से काम करना शुरु किया तो अत्याचार शुरु हो गए. जयप्रकाश नारायण रातों रात गिरफ़्तार कर लिए गए और चंद्रशेखर को कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य होते हुए भी बिना पार्टी से निकाले गिरफ़्तार कर लिया गया.

उस समय जनप्रतिनिधित्व क़ानून में जितने परिवर्तन किए गए वे सिर्फ़ एक नेता की सुविधा के लिए किए गए थे.

उस समय के अत्याचार का तो पूरा रिकॉर्ड है.

इंदिरा पर दूसरी दृष्टि

इंदिरा गांधी का मूल्यांकन करते समय सिर्फ़ आपातकाल की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए.

अब तक जो तेरह-चौदह प्रधानमंत्री हो गए हैं और इन प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में राष्ट्रीय हितों के साथ जिस तरह समझौते हो रहे हैं और केंद्र की सरकारें जिस तरह विदेशी दबावों से झुक रही है, ऐसे में कौन क्या कह रहा है उससे मुझे मतलब नहीं है.

मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूँ कि इन सभी प्रधानमंत्रियों के बीच इंदिरा गाँधी सबसे मज़बूत और एक राष्ट्रवादी नायक के रुप में उभरती हैं.

इस बात का आश्वासन इस देश में कोई नहीं दे सकता कि फिर आपातकाल नहीं लग सकता.

यह तो इस पर निर्भर करेगा कि केंद्र की सत्ता किसके हाथ में हैं. मान लीजिए कि सत्ता पर सोनिया गाँधी बैठ जाती हैं और उनकी सत्ता को उखाड़ने का वैसा ही प्रयास शुरु हो गया जैसा इंदिरा गाँधी के ख़िलाफ़ हुआ था तो यक़ीन मानिए कि सोनिया गाँधी ज़्यादा क्रूर साबित होंगी.

आपातकाल का ख़तरा उसी क्षण पैदा हो जाएगा जिस क्षण वे प्रधानमंत्री बनेंगी.

यह गठबंधन की राजनीति में भी संभव हो सकता है. क्योंकि यह इस पर भी निर्भर करेगा कि इसका नेतृत्व कौन कर रहा है.

जब तक देश की राजनीति रास्ते पर नहीं आ जाती और ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं उभरता जिसे देश के चार बड़े मैदानों पर सुनने हज़ारों लोग उसी तरह नहीं आते जिस तरह इंदिरा गाँधी और नेहरु को सुनने आते थे तब तक तो गठबंधन चलता रहा है.

लोकतंत्र पर असर

आपातकाल ने लोकतंत्र को एक मामले में क्षतिग्रस्त किया तो दूसरे मायने में उसे मज़बूत भी किया.

कई विकृतियाँ आईं. उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री ने निवास से जो देश चलाने की प्रक्रिया शुरु हुई वह बहुत घातक थी.

संविधान में प्रधानमंत्री सचिवालय की कल्पना है लेकिन प्रधानमंत्री निवास का ज़िक्र नहीं है. लेकिन संजय गाँधी जिस तरह उभरे उसने प्रधानमंत्री सचिवालय को दरकिनार कर दिया और प्रधानमंत्री निवास संविधानेत्तर संस्था की तरह कार्य करने लगी.

ये जो संस्थागत दोष उस समय उभरा उनका निवारण आज तक नहीं हो सका है. हमने देखा कि अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद किस तरह से प्रधानमंत्री कार्यालय में रहकर किस तरह काम करते हैं.

इस मायने में आपातकाल ने लोकतंत्र को क्षतिग्रस्त किया.

लेकिन दूसरी ओर आपातकाल लोकतंत्र के लिए वरदान साबित हुआ.

आपातकाल के बाद इस देश के साधारण नागरिक ने 1977 अपने साधारण वोट से उस सत्ता को बदल दिया जिसका कोई सपना भी नहीं देख सकता था.

इससे एक साधारण नागरिक और उसके सहारे हमारे लोकतंत्र जीता. इससे यह भरोसा हुआ कि हम अपने वोट से सरकार को बदल सकते हैं.

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद से इस देश में कोई आंदोलन यदि नहीं उभरा तो इसका एक कारण यह भी था कि साधारण आदमी को यह विश्वास हो गया कि वह अपने वोट से यदि इंदिरा गाँधी को हटा सकते हैं तो हम किसी को भी हटा सकते हैं.

जनता को लगता है कि आंदोलनों से नेता को ताक़त मिलती है उन्हें नहीं. लेकिन जब लगेगा कि उनके अधिकारों का हनन हो रहा है तो आंदोलन एक बार फिर उभरेगा.

मीडिया की भूमिका

बड़े घरानों द्वारा संचालित अख़बारों ने जब वैसा ही लिखना शुरु कर दिया जैसा सेंसर बोर्ड चाहता था तो देश भर में गाँव-गाँव से छोटे छोटे प्रकाशन शुरु हुए जिसने एक बड़ा मीडिया तैयार कर दिया.

बड़े घरानों ने तो मोटे तौर पर सरकार के पिछलग्गू की तरह की काम करना शुरु कर दिया था और आमतौर पर बड़े घरानों के अख़बारों ने तो आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी ऐसी ही पिछलग्गू की भूमिका निभाई थी.

आज भी जब लोकतंत्र फल फूल रहा है तो भी बड़े घरानों के अख़बार सत्ता के पिछलग्गू हैं.

लेकिन इससे न तो मीडिया का महत्व कम होता है न रोल. वह तो लोगों का अपना एक औजार है और लोग अपने हथियार गढ़ ही लेते हैं.

यह एक विरासत है जो हिक्की से शुरु होती है, जिसने हिक्की गजट में वारेन हेस्टिंग्स की नीतियों और उसकी पत्नी के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ खुलकर लिखा और जेल चला गया.

(रेणु अगाल से बातचीत पर आधारित)

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>