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आयोडीन रहित नमक पर फिर प्रतिबंध | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में केंद्र की यूपीए सरकार ने देशभर में नमक की बिक्री के लिए आयोडीन युक्त नमक ही इस्तेमाल करने का आदेश एक बार फिर से जारी कर दिया है. इस आदेश के बाद किसी भी व्यापारी या खुदरा नमक विक्रेताओं के लिए अब खुला और साधारण नमक बेचना संभव नहीं हो सकेगा. यह आदेश देशभर में इसी वर्ष 15 अगस्त से प्रभावी तरीके से लागू होगा. इससे पहले भाजपा के नेतृत्ववाली पिछली केंद्र सरकार ने 13 सितंबर, 2000 को एक आदेश जारी करते हुए भारत के नमक उद्योग को आयोडीन युक्त नमक ही बेचने की अनिवार्यता से मुक्त कर दिया था. करीब चार वर्षों से ज़्यादा अंतराल बीत जाने के बाद अब यह प्रतिबंध फिर से लागू हो गया है. इस नए आदेश की घोषणा करते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याणमंत्री, डॉ ए रामडोस ने कहा, "मुझे नहीं मालूम की पिछली सरकार ने 40 वर्षों से लागू, आयोडीन युक्त नमक ही बेचने के आदेश को क्यों ख़त्म किया था. इससे लोगों और ख़ासतौर पर महिलाओं और बच्चों को क्षति पहुँची है और आकड़ों के मुताबिक इसके बाद आयोडीन की कमी से होने वाले मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है." उन्होंने कहा, "उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्यों और तमाम ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे दुष्परिणाम देखने को मिले हैं जिसके चलते इसे फिर से लागू करने की आवश्यकता पड़ी है. ख़ुद प्रधानमंत्री की मंशा थी कि इसको तत्काल लागू किया जाए." फ़ैसले पर विवाद पर ऐसा नहीं है कि सरकार के इस आदेश से सभी ख़ुश और सहमत हैं. भारत में नमक उत्पादन के क्षेत्र में एक बड़ी हिस्सेदारी उन लघु-कुटीर उद्योगों की है, जो बड़े पैमाने पर नमक तैयार करते हैं. ऐसे में तमाम जानकारों का कहना है कि इस आदेश के फिर से लागू होने का सीधा असर इन छोटे उद्योगों पर पड़ेगा और तमाम छोटे उद्योग ख़त्म भी हो सकते हैं. वजह यह है कि छोटे उद्योगों के पास नमक की पैकिंग के लिए उपकरण नहीं हैं और ऐसे में वायुरोधी पैकेटों में नमक उपलब्ध कराना छोटे उद्योगों की आर्थिक सीमाओं के बाहर की चीज़ होगी. नमक के आंदोलन से लंबे समय से जुड़े जाने-माने गाँधीवादी विचारक, सिद्धराज ढड्ढा तो सरकार के ऊपर सीधा आरोप लगाते हैं कि ऐसा तमाम बड़ी कंपनियों के दबाव में किया जा रहा है. उन्होंने बीबीसी से विशेष बातचीत में बताया, "गाँधी जी ने कहा था कि देश के हर नागरिक को सस्ते से सस्ता नमक उपलब्ध होना चाहिए पर आज की स्थितियां इससे बिल्कुल अलग हैं. लोगों को 12-15 रूपए प्रति किलो की दर से नमक ख़रीद कर खाना पड़ रहा है." वो बताते हैं, "मौजूदा सरकार गाँधी जी के दांडी यात्रा के रास्ते पर चलकर उनके रास्ते को अपनाने का संकल्प कर चुकी है पर इस ख़बर को सुनकर आश्चर्य हो रहा है कि वही सरकार अब साधारण नमक की बिक्री पर प्रतिबंध लगा रही है." सिद्धराज चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं, "यह खेद की बात है कि वर्तमान भारत सरकार फिर से देशी-विदेशी कंपनियों और वैश्विक पूंजीवादी ताकतों के दबाव में आकर देश के सालाना करीब तीन हज़ार करोड़ के नमक के व्यापार को उनके हाथों में सौंप रही है." सरकार और कंपनियों का पक्ष जब इस बाबत हमने केंद्रीय स्वास्थ्यमंत्री ए रामडोस से सवाल किया तो वो बोले, "यह दलील ग़लत है क्योंकि नमक में आयोडीन मिलाने के लिए अब जो तकनीकी उपलब्ध है, उसे छोटे उद्योग भी आसानी से हासिल कर सकते हैं. आयोडीन मिलाने का काम कोई भी कर सकता है." वो बताते हैं, "अब यह कहना ग़लत होगा कि कुटीर उद्योगों को इससे नुकसान होगा क्योंकि आज तकनीकी सभी के लिए उपलब्ध है और सभी की पहुँच में भी है." उन्होंने उन आरोपों का भी खंडन किया जिसमें कहा जा रहा था कि सरकार ने यह फ़ैसला बड़ी नमक उत्पादक कंपनियों के दबाव में आकर लिया है. कुछ ऐसी ही बात देश की बड़ी नमक उत्पादक कंपनी, टाटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सतीश सोहनी ने भी बताई. वो बताते हैं, "मुझे लगता है कि यह केवल एक तरह की ग़लतफ़हमी है क्योंकि इस बारे में बड़े उद्योगों के दबाव का सवाल ही नहीं उठता. देश के बच्चों और महिलाओं की सबसे बड़ी ज़रूरत आयोडीन की कमी को पूरा करना है. यह कोई परमाणु संयंत्र जैसा नहीं है. सभी को साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए." टाटा समूह प्रतिवर्ष 4 लाख, 60 हज़ार टन नमक का उत्पादन करता है. यह देश में कुल नमक उत्पादन का दसवाँ हिस्सा है. सतीश मानते हैं कि सभी बड़े और छोटे उद्योगों को एक साथ एक सहकारी ढाँचे में आकर काम करना चाहिए. उन्होंने कहा, "इस उद्योग से जुड़े घटक हैं. स्वस्थ्य मंत्रालय, नमक कमिश्नर, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, यूनिसेफ़, संगठित-असंगठित क्षेत्र के छोटे-बड़े नमक उत्पादक है. ऐसे में किसी पर कोई ख़तरा नहीं महसूस होना चाहिए." पर नमक के दामों में बढ़ोत्तरी के ख़िलाफ़ ही गाँधी ने 75 वर्ष पहले आंदोलन किया था फिर वर्तमान सरकार नमक के दामों को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम क्यों नहीं उठा रही है, इस सवाल पर स्वस्थ्यमंत्री ने सीधा जवाब देने के बजाय लोगों की सेहत का हवाला दिया. उन्होंने कहा, "नमक में आयोडीन मिलाने से एक साल में एक व्यक्ति पर केवल 10 पैसे का अधिभार पड़ता है. फिर क्षेत्रों में आयोडीन की कमी के कारण जो क्षतियाँ देखने को मिली हैं, उन्हें देखते हुए यह ज़रूरी है." उन्होंने नमक के दामों पर फिलहाल किसी भी तरह की सब्सिडी बढ़ाने से भी इंकार किया. हालांकि उन्होंने कहा कि सरकार नमक के दाम को लेकर ऐसा प्रयास करेगी कि इनमें और बढ़ोत्तरी न हो और वो इस दिशा में प्रयासरत हैं. एक ओर गाँधीवादी विचारको का मानना है कि पिछले अनुभवों से यह साफ़ हो गया है कि आयोडीन का प्रचार महज एक झूठ है और इसका स्वास्थ्य से बहुत कुछ लेना-देना नहीं है. सवाल सेहत का दूसरी ओर इस बाबत सरकार के साथ आयोडीन युक्त नमक को आम लोगों तक पहुँचाने की कोशिश में लगे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डॉक्टर सीएस पांडव बताते हैं कि घेंघा रोग तो केवल एक संकेत भर है, आयोडीन की कमी के कई दूसरे दुष्परिणाम भी हैं जिनके चलते इसे लोगों को उपलब्ध कराना ज़रूरी हो गया है. वो बताते हैं, "हिमयुग के ख़त्म होने के साथ ही तमाम प्रकृतिक आयोडीन समुद्र में पहुँच गया. लोगों को प्राकृतिक रूप से मिलने वाला आयोडीन पर्याप्त नहीं हैं और अविकसित, मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों के पैदा होने के पीछे की यह एक बड़ी वजह है." डॉ पांडव बताते हैं, "अधिकतर मानसिक विकलांग बच्चे और समय से पहले बच्चों के जन्म या गर्भपात की एक बड़ी वजह आयोडीन की कमी हो सकती है. एक किलोग्राम नमक में केवल 30 मिलीग्राम आयोडीन की आवश्यकता होती है." उन्होने ज़ोर देते हुए कहा कि जीवनभर आयोडीन खाने में जितना खर्च होता है, उससे कहीं ज़्यादा इसके इलाज पर हो जाता है. पर नमक की उपलब्धता और उसके आसमान की ओर लपकते दाम एक बड़ी चुनौती के तौर पर लोगों के सामने है. और यही गाँधीवादियों के विरोध एक आधार भी है. |
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