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मंगलवार, 24 मई, 2005 को 11:22 GMT तक के समाचार
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दिल्ली की रातों की युवा धड़कन
दिल्ली की रात
दिल्ली की रात का नज़ारा कुछ अलग ही होता है
रात की बात हो और युवाओं को देखे-जाने बग़ैर तो कम से कम दिल्ली के लिए तो यह बेमानी ही होगा सो रात के दूसरे सफ़र पर निकलने वक़्त हमने दिल्ली के इसी युवा मन की थाह लेनी चाही.

देखा, दिल्ली रात को धड़कती है तो इन्हीं युवाओं के दिल से पर दिलों में धड़कनों और उमंगों के अलावा दर्द और बेबसी भी है.

कहीं जीने और कुछ पाने का संघर्ष है तो कहीं कुछ भी होश नहीं, बस अपनी ज़िंदगी और अपने सपनों की दुनिया ही नज़र आती है.

आइए, इसी दिल्ली के सफ़र पर चलते हैं पाणिनी आनंद के साथ-

बेबसी का शहर

सफ़र पर निकले तो बस पकड़ी और सबसे पहले पहुँचे आईआईटी,दिल्ली यानी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की ओर, जहाँ हमारी मुलाक़ात हुई संदीप से.

संदीप दिल्ली में हज़ारों की तादाद में रह रहे उन युवाओं की तरह हैं जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दिल्ली आते हैं और यहाँ मेडिकल, इंजीनियरिंग या सिविल सेवा जैसी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग करते हैं.

संदीप बिहार के पूर्णिया ज़िले के रहने वाले हैं और यहाँ इंजीनियरिंग की तैयारी में लगे हैं.

पर दिल्ली उनकी पसंद नहीं, ज़रूरत है और यही वजह उनको दिल्ली ले आई.

आईआईटी से लगे टी-स्टाल पर चाय पीते संदीप ने हमें बताया, “घर छोड़कर कौन आना चाहता है पर तैयारी तो करनी ही है. यहाँ के माहौल में हम ख़ुद को ढाल नहीं पा रहे हैं. सबसे ज़्यादा दिक्कत स्वास्थ्य को लेकर है.”

विश्वविद्यालय या अभयारण्य

आगे बढ़े और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की ओर आ निकले. यहाँ का गंगा ढाबा दुनियाभर में अपनी ग़रमाग़रम जनवादी और समाजवादी चर्चाओं के लिए जाना जाता रहा है पर अब उन तेवरों की छाया ही बाकी है, गंभीर बहसें पुरानी बात जैसी लगती हैं.

क्या हैं ज़मीनी हालत, हमें निशांत ने बताया. वो बताते हैं, “अब भी वो चर्चाएँ और सवाल तो हैं पर केवल बातें ही बची हैं, काम के नाम पर कुछ नहीं हो रहा है.”

इन्हीं बदलते हालातों के चलते आलोचक इसे अभयारण्य भी कहते हैं, जहाँ शेर तो होते हैं पर एक तय सीमा में, उसके बाहर वो नहीं जाते.

वजह जाननी चाही तो पता चला कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बदलती दुनिया इसकी बड़ी वजह हैं.

पैसा सब कुछ नहीं

एक तरफ़ तो पैसे और नौकरी की लड़ाई है पर युवाओं की एक जिंदगी ऐसी भी है जो पैसे के ढेर पर बैठकर सुकून माँग रही है.

दिल्ली में युवाओं का एक बड़ा सपना होता है, पढ़ाई या बाकी कामों के साथ ही कॉलसेंटरों में काम करने का. वजह है अच्छा पैसा, आराम की ज़िदगी, मौजमस्ती और बहुत कुछ...

पर सुकून नहीं है और पिछले दिनों ऐसे कुछ युवाओं ने नशे का सहारा लिया है और कुछ ने आत्महत्याएँ भी की हैं.

कॉलसेंटरों में काम कर रहे युवाओं से जब हमने इस बारे में बात की तो अनूप ने बताया, “पैसा है मगर पैसा सबकुछ नहीं है. रातों को काम करनेवाले युवा सामाजिक जीवन से कट जाते हैं और फिर हीनभावना और अकेलेपन का शिकार होकर ऐसे अंजाम तक पहुँचते हैं.”

धुँआ है ज़िंदगी

इसी दिल्ली के बड़े घरों और अभिजात्य वर्ग के युवा एक दूसरी ही दुनिया में रहते हैं.
यह दुनिया है बारों और पबों के फ़र्श पर नशे में डूबे, थिरकते-बहकते युवा की.

ऐसे ही एक धुँए और शराब की महक में डूबे बार में हम पहुँचे और लोगों से पूछा कि ये लोग ऐसी जगहों पर क्यों आते हैं. जवाब मिला, “दिनभर के काम और भागदौड़ के बाद अगर कुछ देर अपने दोस्तों के साथ मस्ती भरे माहौल में बिताते हैं तो क्या हर्ज है.”

इन युवाओं को सबकुछ चाहिए पर बहुत थोड़े से वक़्त में. इन्हें साधना की नहीं संसाधनों की चिंता है और परंपराओं को ढोने की जगह पैसा इनके नए महलों को खड़ा करने का सामान है.

कुछ इस तरह ही दिल्ली के युवा कंधे अपनी ज़िम्मेदारियों और महात्वाकांक्षाओं का बोझ लेकर आगे बढ़ रहे हैं जिसमें कुछ पाने की चाहत है तो कई चीज़ों को बदल देने के तेवर. पर इन तेवरों की दिशा क्या है, इसे समझ पाना न उनके बस का है और न देखनेवालों के.

दिल्ली कुछ ऐसे ही तेवरों का शहर है.

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