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फुटपाथ पर गुज़रती ज़िंदगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब सूरज डूबता है तो एक दुनिया सो जाती है, सपनों में खो जाती है लेकिन एक दुनिया ऐसी भी होती है जो अंधेरों में भी चलती रहती है. महानगरों की रात की ज़िंदगी में किसकी रुचि नहीं होगी, फिर दिल्ली तो देश की राजधानी है. इसलिए सुदूर गाँवों से लेकर विदेशों तक में फैले हुए भारतीयों के लिए यह हमेशा ही जिज्ञासा का विषय रहा है कि दिल्ली में रात की ज़िंदगी किस तरह चलती है. अपने पाठकों को इसी से परिचित कराने के लिए पाणिनी आनंद निकले दिल्ली में रात के सफ़र पर. तीन रातों के इस सफ़र में हम उस दिल्ली की बात करेंगे जो अपनी तमाम रातें फ़ुटपाथ पर गुज़ार देती है- फ़ुटपाथ पर जिंदगी गुज़ार देने वाली इस दुनिया में 12 घंटे के बाद सूरज तो उगता है पर उनकी ज़िंदगी में इतने भर से सुबह नहीं होती. बेशक, दिल्ली का नाम ध्यान आते ही जो छवि मन में उभरती है, उसमें चमकते-महकते चेहरे, लंबी कारें, संसद भवन और वैभव-विलास से सराबोर महानगर ध्यान आता है पर लगभग 70 प्रतिशत दिल्ली की हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है. पहली रात जब दिल्ली को क़रीब से देखने की कोशिश की तो पाया कि इस सच के अनगिनत चेहरे यहाँ की सड़कों पर ही पसरे-बिखरे हुए हैं. फ्लाईओवर ही छत रौशनी से नहाए इस शहर के एक फ़्लाईओवर के नीचे हमें उर्मिला पवार मिल गईं. उर्मिला अपने नौ बच्चों के साथ लाल बत्ती पर रुकनेवाले वाहनों में बैठे लोगों को गजरे, गुब्बारे और फूल बेचती हैं.
महाराष्ट्र से दिल्ली आई उर्मिला, आख़िर शोलापुर छोड़कर क्यों आई? पूछने पर वो बताती हैं, “अपने गाँव को कौन नहीं चाहता पर क्या करें, अगर वहीं रहते तो भूखे मरते, सो दिल्ली चले आए.” पर दिल्ली आकर भी उनकी समस्याओं को हल नहीं मिला. दिल्ली के पुलिसवाले कहते हैं कि फ्लाईओवरों के नीचे रहनेवाले ये लोग छोटे अपराधों को अंजाम देते हैं पर उर्मिला इसको बेवजह परेशान करना मानती हैं. वो कहती हैं कि पुलिस के लिए तो जो ग़रीब है, वो अपराधी है. उसे यह नहीं दिखता कि कौन कितनी मेहनत से काम करके अपनी एक वक़्त की रोटी का जुगाड़ रहा है. संस्थाओं का अर्थशास्त्र वहाँ से निकलकर हम पूर्वी दिल्ली के एक मुख्य मार्ग पर पहुँचे. वहाँ फ़ुटपाथ पर लेटे लोगों को बताया कि पत्रकार हूँ, तो भड़क उठे. यह ग़ुस्सा महँगाई, कुव्यवस्था और अपनी दुर्दशा को लेकर है और इनके मुताबिक सारा दोष नेताओं का है. उनमें से एक ने हमें बताया, “यहाँ कितनी ही संस्था वाले आए और नेता भी. सब अपना काम निकालकर और हमारे फ़ोटो ख़ीचकर आगे बढ़ गए पर हमें कोई रियायत नहीं मिली. लोग तो हमारे नाम पर खा रहे हैं.” असुरक्षित महिलाएँ वहाँ से हम बुद्ध पार्क होते हुए धौला कुँआ क्षेत्र में आ गए. पिछले दिनों यहाँ एक छात्रा के साथ बलात्कार हो गया था. शायद इसीलिए बस स्टॉपों पर महिलाओं की आमतौर पर दिखने वाली संख्या नज़र नहीं आ रही थी. कुछ महिलाएँ दिखीं तो हमने उनसे इसकी वजह जाननी चाही. पता चला, “हम अपने स्तर पर यह जोखिम उठाते हैं नहीं तो प्रशासन और लोगों से क्या आशा की जा सकती है. अगर लोग और पुलिसवाले महिलाओं की सुरक्षा के लिए आगे आएँ तो ऐसी वारदातें हों ही ना.” रास्ते में कुछ जगहों पर यौनकर्मी महिलाएँ भी दिखीं. हमने इनसे बात करनी चाही पर जवाब मिला, काम की बात करो, बेकार की नहीं. दर्दभरी दवा ख़ैर हम आगे बढ़े और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की ओर आ निकले. यहाँ देशभर से लोग अपना इलाज कराने आते हैं. ग़रीबों के लिए तो यह आख़िरी विकल्प जैसा है और इसलिए अस्पताल के सामने, फुटपाथ पर मरीज़ों के रिश्तेदार रात को सोते हुए मिल जाते हैं. यहीं हमें बनारस से आई एक महिला मिली जो अपनी बेटी के इलाज के लिए दिल्ली आई है और अपनी बेटी के साथ फ़ुटपाथ पर ही रात बिताने को मजबूर हैं. पर इलाज बनारस के ही जाने-माने मेडिकल कॉलेज में क्यों नहीं करवाया? पूछने पर वो बताती हैं कि वहाँ इलाज के लिए मोटी रक़म चाहिए और वो उनके पास है नहीं, सो मरता क्या न करता वाली हालत ही है. रात के कितने ही ऐसे चेहरे हैं. किस-किस को याद करें. अव्वल तो दिखते नहीं पर देखने लगो तो ताज्जुब होता है कि ज़िंदगी इस तरह भी गुज़ारी जाती है. |
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