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खुले आसमान के नीचे कटती रातें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक सुंदर घर का सपना कितना मोहक होता है और उस सपने को सच करने के लिए लोग महानगरों की ओर भागते हैं. मगर क्या सुखी जीवन का ये सपना सच हो पाता है? महानगर की भागदौड़ में शायद ये इतनी आसानी से संभव नहीं हो पाता और इसी का नतीजा है कि अभी साल का पहला महीना बीता ही है कि 3,250 बेघर और गुमनाम लोग दिल्ली की सड़कों पर मृत पाए जा चुके हैं. ये आँकड़े निश्चित ही काफ़ी चौंकाने वाले हैं मगर शायद सच्चाई कुछ ऐसी ही है. दिल्ली के संयुक्त पुलिस आयुक्त आमोद कंठ कहते हैं कि किसी भी सभ्य समाज के लिए ये बहुत ही दयनीय स्थिति होती है. दिल्ली की कड़ाके की सर्दी में बेघर व्यक्तियों को रात में कम से कम एक छत मुहैया कराई जा सके इसलिए रैन बसेरे शुरू किए गए थे. मगर बेघर लोगों की संख्या जहाँ बढ़ी है वहीं इन रैन बसेरों की संख्या कम होती जा रही है. दिल्ली में अब ऐसे सिर्फ़ 12 सरकारी रैन बसेरे ही हैं. अचरज की दूसरी बात ये है कि इन सरकारी रैन बसेरों में लड़कियों या महिलाओं को रात गुज़ारने की इजाज़त नहीं है.
दिल्ली के कनॉट प्लेस में हनुमान मंदिर के बाहर आग तापती 80 वर्षीया हर्षलता बताती हैं कि पिछले 20 वर्षों से वह इसी तरह गर्मी, सर्दी और बरसात में मंदिर के छज्जों के नीचे अपनी रातें गुज़ारती हैं. इस बारे में रैन बसेरे में जाने की अनुमति प्राप्त श्रीकांत कहते हैं कि सरकारी रैन बसेरों में इन महिलाओं के रात गुज़ारने की भी सुविधा होनी चाहिए. कुछ निजी संस्थाएँ ऐसी हैं जिन्होंने महिलाओं को रैन बसेरे में जगह दी है मगर इनकी संख्या बहुत ही कम है. सेंट कोलंबस चर्च में चल रहे रैन बसेरे में रहने वाली आशा और इंदू बताती हैं कि ये रैन बसेरा कुछ साल पहले ही शुरू हुआ था मगर इससे पहले वह और दूसरी बहुत सी अन्य महिलाएँ खुले आसमान के नीचे रात बिताने के लिए मजबूर थीं. दिल्ली में सरकारी और निजी रैन बसेरों की संख्या 43 है परंतु इनमें सिर्फ़ चार हज़ार व्यक्ति ही रात को सो सकते हैं जबकि ज़रूरत कई गुना ज़्यादा है. हाल ही में निजी संस्थाओं की एक कमेटी ने ये प्रस्ताव दिया है कि बेघर व्यक्तियों को रात में सरकारी दफ़्तरों में भी रहने के लिए जगह दी जा सकती है. मगर इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर अमल तभी हो सकता है जबकि हर नागरिक के जीने के अधिकार को प्राथमिकता दी जाए और हम ज़्यादा संवेदनशील बन पाएँ. |
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