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बिहार में राष्ट्रपति शासन के ही आसार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार में नई विधानसभा के गठन के लिए रविवार आख़िरी दिन है यानी छह मार्च तक नई विधानसभा का गठन हो जाना चाहिए नहीं तो वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाना ही अंतिम विकल्प होगा. मौजूदा 12वीं विधान सभा का कार्यकाल रविवार को भारतीय समय के अनुसार रात बारह बजे समाप्त हो जाएगा और 13 वीं विधान सभा के गठन की अधिसूचना तो पहले ही जारी कर दी गई है. लेकिन अभी तक किसी भी दल के पास सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत यानी 122 विधायकों का समर्थन हासिल नहीं है. और जिस तरह की राजनीतिक परिस्थितियाँ बिहार में अब तक दिखाई दे रही हैं उससे तो बिहार में राष्ट्रपति शासन के ही आसार दिख रहे हैं. लेकिन राज्यपाल बूटा सिंह तकनीकी तौर पर रात बारह बजे तक इंतज़ार करेंगे और तब तक अगर को दल 122 सदस्यों का समर्थन लेकर अगर उनके पास नहीं जाता है तो राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा. अंकगणित के हिसाब से बिहार का राजनीतिक भविष्य एक तरह से रामविलास पासवान के हाथों में है और वह अब तक किसी भी गठबंधन की ओर जाने का मन नहीं बना पाए हैं. गोवा और फिर झारखंड में जैसी किरकिरी हुई है उसके बाद राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार में राज्यपाल बूटासिंह कोई भी कदम पुख्ता परीक्षणों के बाद ही उठाएँगे. अंकगणित बिहार की 243 सदस्यों वाली विधानसभा में आरजेडी के 75 विधायक चुनकर आए हैं. वे जितने समर्थन का दावा कर रहे हैं उसके आधार पर भी उनके विधायकों की संख्या 106 तक पहुँच पाती है. ये आँकड़ा सरकार बनाने लायक ज़रूरी 122 सदस्यों के समर्थन से काफ़ी पीछे रहता है. उधर भाजपा-जनतादल युनाइटेड और अन्य दलों के गठबंधन एनडीए ने राज्यपाल के पास जाकर राबड़ी देवी के सरकार बनाने के दावे का विरोध किया है और कहा है कि जनादेश आरजेडी के ख़िलाफ़ है. हालांकि एनडीए चुनाव पूर्व का सबसे बड़ा गठबंधन है लेकिन उसके पास भी बहुमत जुटाने के लिए विधायक नहीं है और इसीलिए एनडीए ने अभी तक सरकार बनाने का दावा नहीं किया है. संभावनाएँ रामविलास पासवान अपने 29 विधायकों के साथ साफ़ कर चुके हैं कि न तो वे आरजेडी को समर्थन देने वाले हैं और न भाजपा को. रविवार को सुबह राज्यपाल ने उन्हें बुलाकर उनसे बात की है और जैसी कि ख़बरें हैं पासवान ने उनसे भी कहा है कि वे दोनों में से किसी भी पार्टी को समर्थन नहीं दे रहे हैं.
इस परिस्थिति में अब राजनीतिक संभावनाएँ सीमित दिखाई देती हैं. सबसे अधिक जिस संभावना पर चर्चा हो रही है उसमें यह है कि जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व में सरकार बने जिसमें रामविलास पासवान की पार्टी शामिल हो और भाजपा बाहर से समर्थन दे. विश्लेषक कह रहे हैं कि इस तरह रामविलास पासवान कह सकेंगे कि राज्य में एक धर्मनिरपेक्ष सरकार है और भाजपा को समर्थन न देने की शर्त भी पूरी हो सकेगी. लेकिन इस गणित के लिए शनिवार शाम तक भाजपा के तैयार होने की ख़बर नहीं थी. लेकिन रामविलास पासवान का दावा है कि वे जनता दल यूनाइटेड के किसी भी नेता के संपर्क में नहीं हैं. रामविलास पासवान तो चुनाव के दौरान ही राष्ट्रपति शासन की बात कर रहे थे इसलिए ऐसा लगता है कि वे इसके लिए तैयार हैं. लेकिन आरजेडी इसके लिए तैयार नहीं दिखती लेकिन अब उनके पास भी कोई विकल्प नहीं दिखता. कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है लेकिन बिहार में किसी चमत्कार की उम्मीद कम ही दिखाई दे रही है. |
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