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बुधवार, 16 फ़रवरी, 2005 को 11:49 GMT तक के समाचार
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शांति प्रक्रिया के नए दौर पर नज़र
मुशर्रफ़ और मनमोहन सिंह
मनमोहन सिंह ने न्यूयॉर्क में मुशर्रफ़ से मुलाक़ात की
दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर चरमपंथी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में आई खटास उस समय कम पड़नी शुरू हुई जब अप्रैल 2003 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया.

आइए नज़र डालते हैं अप्रैल, 2003 से भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ी.

अप्रैल 2003

भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के सामने दोस्ती का हाथ बढ़ाया. उस सभा में वाजपेयी ने कहा कि दोनों देशों के बीच शांति के लिए बातचीत की एकमात्र रास्ता है.

मई 2003

अपनी पेशकश को आगे बढ़ाते हुए वाजपेयी सरकार ने मई, 2003 में दिल्ली और लाहौर के बीच बस सेवा को शुरू करने की घोषणा की. पाकिस्तान ने इसे सकारात्मक क़दम की संज्ञा दी. राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद दोनों देशों ने एक-दूसरे के यहाँ उच्चायुक्त नियुक्त करने की घोषणा की. पाकिस्तान द्वारा कई भारतीय क़ैदियों की रिहाई के बाद भारत ने भी पाकिस्तानी क़ैदियों को छोड़ने की घोषणा की.

अक्तूबर 2003

कश्मीर विवाद पर दोनों देशों के बीच प्रगति की दिशा में भारत सरकार ने कई महत्वपूर्ण क़दम उठाए.

नवंबर 2003

कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर भारत और पाकिस्तान ने संघर्ष विराम की घोषणा की. इससे पहले ही दोनों देशों ने अपने सैनिकों को नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी रोकने का आदेश दे दिया था.

दिसंबर 2003

दो साल के बाद भारत और पाकिस्तान ने एक जनवरी से हवाई संपर्क बहाल करने की घोषणा की.

जनवरी 2004

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वाजपेयी ने की थी शांति प्रक्रिया की पहल

इस्लामाबाद में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) सम्मेलन के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक घंटे बातचीत की. ये दोनों नेताओं के बीच क़रीब तीन साल बाद हुई बातचीत थी. दोनों देशों ने ऐतिहासिक बातचीत में हुई प्रगति का स्वागत किया.

उसी महीने भारत सरकार और कश्मीर में उदारवादी अलगाववादी नेताओं के बीच भी ऐतिहासिक बातचीत हुई. दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि कश्मीर में हिंसा की घटनाओं पर लगाम लगनी चाहिए.

फरवरी 2004

तीन साल बाद भारत और पाकिस्तान के बीच औपचारिक बातचीत शुरू हुई. बातचीत के एजेंडा में कश्मीर प्रमुख था. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में तीन दिनों तक चला विचार-विमर्श का मक़सद था व्यापक स्तर पर शांति वार्ता के लिए मार्ग प्रशस्त करना.

मार्च 2004

भारतीय क्रिकेट टीम ने 1989 के बाद पाकिस्तान का दौरा किया. दोनों देशों के बीच एक दिवसीय और टेस्ट मैचों की सिरीज़ हुई जिसमें भारतीय टीम विजयी रही. बिना किसी घटना के संपन्न हुए भारतीय क्रिकेट टीम का पाकिस्तान में ज़बरदस्त स्वागत हुआ.

मई 2004

लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार की हार हुई और कांग्रेस गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री का पद संभाला मनमोहन सिंह ने. मनमोहन सिंह ने भी घोषणा की कि भारत पाकिस्तान के साथ मित्रतापूर्ण संबंध चाहता है. पाकिस्तान ने नए प्रधानमंत्री की घोषणा का स्वागत किया.

जून 2004

भारत और पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों के परीक्षण पर प्रतिबंध को फिर से लागू किया और भविष्य में परमाणु ख़तरे से एक-दूसरे को आगाह करने के लिए एक हॉट लाइन संपर्क स्थापित करने की घोषणा की.

सितंबर 2004

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भारतीय टीम का पाकिस्तान में ज़बरदस्त स्वागत

तीन साल बाद भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्री दिल्ली में मिले. दोनों पक्षों ने घोषणा की कि कुछ प्रगति हुई है लेकिन दिखाने के लिए नतीजे कम ही थे. कश्मीर पर कोई सहमति की संभावना भी कम ही नज़र आई.

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न्यूयॉर्क में बातचीत की. पहली बार दोनों नेताओं ने कश्मीर विवाद के लिए हल के तरीक़ों पर विचार-विमर्श किया. दोनों नेताओं ने सियाचिन ग्लेशियर में मौजूद सैनिकों की वापसी पर भी बातचीत की.

अक्तूबर 2004

पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने कश्मीर विवाद ख़त्म करने के लिए अपनी ओर से कुछ अनोखे प्रस्ताव रखे. उनका एक प्रस्ताव था- कश्मीर के विवादित क्षेत्र से सैनिकों को हटा दिया जाए और दोनों देश संयुक्त रूप से इसका प्रशासन देखें.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने यह भी प्रस्ताव रखा कि पाकिस्तान कश्मीर में जनमतसंग्रह का अपना प्रस्ताव वापस ले सकता है.

लेकिन भारत ने इस प्रस्ताव पर ठंडी प्रतिक्रिया दी और कहा कि पाकिस्तान आधिकारिक माध्यम से कश्मीर पर विचार-विमर्श करे.

नवंबर 2004

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री का पद संभालने के बाद कश्मीर की यात्रा की और भारत ने कश्मीर से अपने कुछ सैनिकों की वापसी शुरू की. एक हज़ार सैनिकों की पहली टुकड़ी ने अनंतनाग से वापसी की. लेकिन इस बारे में अस्पष्टता बनी रही कि कितनी संख्या में भारतीय सैनिकों को कश्मीर से हटाया जाएगा.

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