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मंगलवार, 15 फ़रवरी, 2005 को 21:15 GMT तक के समाचार
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सूनी सड़कें और परेशान जनता

सूनी सड़कें
सड़कों पर कुछेक वाहन चल रहे हैं लेकिन वाहनों की हालत ख़स्ता ही है.
चुनाव न सिर्फ़ अपने साथ कभी न पूरे होने वाले वायदों की बौछार लेकर आते हैं बल्कि चुनाव के मौसम का लगभग एक महीना जनता के लिए मुसीबतों का सबब भी बनता है.

चुनाव से जुड़ी जनता की सबसे बड़ी परेशानी है आवागमन के साधनों का अभाव.

बिहार और झारखंड में पिछले दस दिनों से घूमते हुए मुझे आमतौर पर सड़कें हमेशा वीरान ही दिखीं. कहीं-कहीं इक्का-दुक्का गाड़ियाँ दिखीं तो उस पर लोग मधुमक्खी के छत्ते की तरह लदे नज़र आए.

ट्रांसपोर्टरों से बात करने पर पता चला कि मतदान की तय तिथि से क़रीब महीने भर पहले ही वाहनों को चुनावी ड्यूटी के लिए पकड़ने की शुरूआत हो जाती है. हालाँकि शुरू में ट्रक से जैसे बड़े वाहनों को ही पकड़ा जाता है.

हालाँकि चुनाव आयोग का इतने पहले से गाड़ियाँ ज़ब्त करने का ऐसा कोई आदेश नहीं रहता है, लेकिन ज़िला प्रशासन ऐहतियात के तौर पर पहले से ही सक्रिय हो जाता है.

समस्तीपुर के ड्राइवर रामनिवास ने कहा, “ हमें 15 फ़रवरी के चुनाव के लिए गाड़ी जमा कराने का नोटिस सात तारीख़ को मिला. लेकिन हमारे कई परिचितों की गाड़ी के काग़ज़ उससे पहले ही ज़ब्त किए जा चुके थे.”

यह पूछे जाने पर कि लोग चुनाव ड्यूटी के लिए अपनी गाड़ियाँ क्यों नहीं देना चाहते, उन्होंने कहा, “दरअसल गाड़ियों के लिए बहुत कम भुगतान की पेशकश की जाती है, और वो भी शायद ही हाथ में आ पाता है. इसके अलावा गाड़ियों में टूटफूट होनी तय ही है.”

भरी हुई बसें
देखिए एक वाहन और सौ सवारियां

उन्होंने कहा कि एक चुनाव में लगी गाड़ी का किराया अगले चुनाव तक ही मिल पाता है, “वो भी केवल प्रभावशाली को ही मिल पाता है क्योंकि सरकार से पैसा वसूलना शेर के मुँह से निवाला निकालने के समान होता है.”

हालाँकि देवघर में किशुन महतो नामक ड्राइवर ने बताया कि झारखंड में इस बार चुनाव ड्यूटी में अपनी गाड़ियाँ भेजने वाले ट्रांसपोर्टरों रोज़ नक़द भाड़ा दिया जा रहा है.

कहीं मुसीबत, कहीं मौज़

ड्राइवरों से बातचीत करने पर एक दिलचस्प बात पता चली कि ट्रांसपोर्टरों को भले ही अपनी गाड़ियाँ चुनाव ड्यूटी में भेजे जाने पर चिंता हो, ड्राइवरों को कोई आपत्ति नहीं होती.

राज़ पूछे जाने पर मटिहानी के दिलीप राय ने कहा, “ड्राइवरों की तो मौज़ रहती है चुनाव ड्यूटी में. उन्हें ख़ुराकी के रूप में रोज़ 200 रुपये तो मिलते ही हैं. गाड़ी की टंकी भी फ़ुल रहती है, इसलिए तेल का भी खेल होता है.”

वाहन मालिकों को होनेवाली परेशानियों के बारे में उन्होंने कहा, ”परेशानी चुनाव आयोग की सख़्ती के कारण कम, भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के कारण ज़्यादा होती है जो तय समय से पहले ही गाड़ी ज़ब्त करने की धमकी देकर पैसे ऐंठते हैं.”

जो भी हो, इतना तो तय है कि चुनावों के मौसम में आम यात्री राम भरोसे ही रहते हैं. उनकी सुध लेने न तो कोई नेता आता है, और न ही चुनाव आयोग.

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