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बुधवार, 26 जनवरी, 2005 को 10:10 GMT तक के समाचार
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खुले बाज़ार पर हावी है तस्करी का माल

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भूमंडलीकरण के दौर में इंपोर्टेड अब इतना इंपोर्टेड भी नहीं रह गया है.

जेब में पैसे हों तो दुनिया भर की चीज़ें आपके अपने शहर में आपको सुलभ हो सकती हैं.

हाँ, मगर जो सामान आप ख़रीद रहे हैं, वो ज़रूरी नहीं कि खुले बाज़ार के रास्ते आया हो.

तस्करी का माल अभी भी भारत के बाज़ारों में आसानी से सुलभ है और खरीदार इसे हाथों-हाथ ले रहे हैं.

दिल्ली के पालिका बाज़ार को ही ले लीजिए, फिर सीमावर्ती क्षेत्रों के तो कहने ही क्या.

भारत-नेपाल सीमा से लगे चंपावत जिले में जब हम टनकपुर बाज़ार में पहुँचे तो पाया कि बाज़ार चीन और नेपाल के सामान से पटा पड़ा है.

चाहे कपड़े लेने हों, या फिर जूते, खिलौने और सजावटी सामान से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, भारतीय सामान पर इन देशों का माल हावी है.

जो जेब को भाए

वजह सीधी सी है, इन देशों का सामान भारतीय सामान से सस्ता है और किसी भी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड जितना टिकाऊ. सो ग्राहक की पहली पसंद यही माल रहते हैं.

बाज़ार में ही हमने एक स्थानीय नागरिक, ललित कुमार से बात की तो उन्होंने अपने जूतों की ओर इशारा करके बताया, “ये नेपाल में बने जूते केवल 150 रूपए के हैं और दो साल से चल रहे हैं. अपने यहाँ के होते तो अबतक तीन जोड़ी ख़रीद चुका होता.”

पर ऐसा नहीं है कि केवल ग्राहक ही ऐसा माल लेना चाहते हैं. दुकानदारों के लिए भी यह ज़्यादा मुनाफ़े की चीज़ हैं.

तमाम दुकानदार आसानी से सात-आठ किलोमीटर की यात्रा करके नेपाल से सामान उठा लाते हैं और वो भी बगैर परमिट के.

यानी सीमा से लगे पूर्णगिरि धाम के दर्शन और इस बहाने तस्करी के माल की आमद आसानी से हो जाती है.

एक ऐसे ही दुकानदार अमर सिंह बताते हैं, “यहाँ की दुकानों में तकरीबन आधा सामान चीन और नेपाल का है. इस सामान का बड़ा हिस्सा तो बिना सरकारी परमिट के आ जाता है.”

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सभी दुकानदारों के पास नेपाल और चीन का माल मौजूद है.

वो बताते हैं, “सनील के कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक सामान की यहाँ ख़ूब माँग है और इन दोनों की ही सीधी आमद पर रोक है पर सामान आ रहा है और बिक रहा है.”

जब उनसे भारतीय सामान की ख़पत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, “बाज़ार में कुछ सामान तो बगैर परमिट वाला है और जो हम लोग दिल्ली से ला रहे हैं, वो भी भारतीय कहाँ है, अधिकतर तो चीन और बाकी जगहों का है.”

माओवादियों का ख़तरा

भले ही यह इस बहस के बाहर का मुद्दा हो, पर है एक अहम सवाल.

पिछले दिनों इस क्षेत्र में माओवादियों की गतिविधियाँ बढ़ी हैं और इसका असर बाज़ार पर पड़ा है.

तस्करी से सामान लाना इतना आसान नहीं रह गया है. पकड़े जाने या माओवादियों के हाथों मारे जाने का ख़तरा बना रहता है.

लोगों का शाम के बाद घरों से निकलना भी कम हुआ है और इसके चलते बाज़ार में खरीदार भी कम हैं.

व्यापारियों के लिए एक बड़े बाज़ार के रूप में उभरा पूर्णागिरि मंदिर का बाज़ार भी पिछले कुछ दिनों से प्रशासन ने बंद करा रखा है.

इस नई समस्या का असर केवल तस्करी पर ही नहीं है. यह तो बाज़ार पर मार है फिर माल भारत का हो या तस्करी का.

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