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दोबारा बेघर हुए लोगों का दर्द | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका के ट्रिन्कोमली शहर के बाहर आल्लस गार्डेन के एक विशाल शरणार्थी शिविर में पिछले 15 सालों से रह रहे हैं. यह शिविर बिल्कुल समुद्र के किनारे बसा है. लगभग सभी परिवार मछुआरों के हैं. जो लोग पहले किसान थे वो भी अब इसी व्यवसाय लगे हैं. जितना नुक़सान इन परिवारों ने वर्षों से जारी गृह युद्ध के कारण नहीं झेला था उतना सूनामी के कारण हो गया. 26 दिसंबर को सभी लोग अपने घरों मे ही थे. पिछले दिन क्रिसमस का त्योहार था इसीलिए ये लोग मछली मारने नहीं गए थे. सभी नावें तट पर ही थीं. रवि कुमार अपने परिवार के साथ बाज़ार गए थे. घर पर उनकी बूढी माँ अकेले थीं. जब रवि अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वापस आए तो देखा कि शिविर का आधा इलाक़ा मलबे में बदल गया है. वे बताते हैं, "मैं बाज़ार से भागता हुआ घर आया था. वहीं पर लोग बता रहे थे कि समुद्र का पानी शहर में घुस रहा है. वहाँ अफ़रा तफ़री मची थी. बच्चों को लेकर घर आया तो देखा कि जिस झोपडी में हम रहते थे वो नष्ट हो गई है. पर मेरी माँ को भगवान ने बचा लिया मगर मेरी नाव का पता नही है.'' रवि अब काम के तलाश मे हैं. दुखद अनुभव रवि की तरह ही सैकड़ों परिवार एक बार फिर बेघर हो गए हैं. इन्हें सिर छुपाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणर्थी संस्था की ओर से दिए गए तंबुओं में रहना पड़ रहा है. सरस्वती का कहना है कि तंबू में रात गुज़ारना मुश्किल होता है. "तंबू में दरवाजा नही हैं, औरतों के लिए यही सबसे बड़ी दिक्कत है. कपडे बदलना मुश्किल हो जाता है. जब रात में पानी बरसता है तो और हालत और भी खराब हो जाती है.'' कुछ परिवार जिनके घर सुरक्षित बच गए, उन्होंने कुछ अन्य परिवारों को अपने घरों मे बुला लिया है. इसी शिविर में रह रहे राजेंद्रन कहते हैं, "एक घर, जिसमें केवल एक ही कमरा है, तीन-तीन परिवार रह रहे हैं. पर यह ज़्यादा दिन नही चलेगा. नए घर बनाने होंगे. पर सरकार कुछ नही कर रही है." उनका कहना है, "कुछ दिनों तक खाना बाँटा गया, पर अब वो भी बंद हो गया है. हम मछली मारने भी नही जा सकते हैं क्योंकि नाव भी टूट गयी है. पैसा कमाने का कोई रास्ता ही नही है.'' कन्द्स्वामी आल्लेस गार्डेन कैम्प में कई वर्षों से काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि "सूनामी ने इन शरणार्थियों को दोबारा शरणार्थी बना दिया है. अब यह लोग खाने के मोहताज हैं. इतना बुरा हाल तो युद्ध के दौरान नही हुआ था.'' अब रोज़ी के लिए यहाँ के मछुआरों को म़ज़दूरी करनी पड़ेगी, और कोई चारा नहीं है. सरकार ने इनको हुए नुक़सान की भरपाई की कोई व्यवस्था नहीं की है. |
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