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'पेट्रोल पंप लेना हो तो इस्तीफ़ा दें' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुप्रीम कोर्ट की एक उच्च स्तरीय समिति की सिफ़ारिश है कि एक तो संसद सदस्यों को पेट्रोलियम पदार्थों की डीलरशिप देनी नहीं चाहिए और यदि उन्हें डीलरशिप लेनी हो तो संसद की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. पेट्रोल पंप घोटाले की जाँच कर रही दो जजों की एक समिति ने यह सिफ़ारिश की है. इस सिफ़ारिश पर केंद्र सरकार ने एक शपथ पत्र देकर कहा है कि वह इस सिफ़ारिश से सहमत है. यह वही समिति है जिसने पहले 296 पेट्रोल पंपों के आबंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की थी. सुप्रीम कोर्ट ने यह समिति 12 दिसंबर 2002 को गठित की थी. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि संसद सदस्यों को संसद की बैठकों के अलावा संसदीय समितियों की बैठकों में हिस्सा लेना होता है और ऐसे में उसके पास समय नहीं होता कि वह पेट्रोलियम डीलर की तरह अपनी ज़िम्मेदारी निभा ले. समिति का कहना था कि यदि सांसदों को डीलरशिप दी जाती है तो वे लोगों को नौकरियों पर रखकर उनसे काम लेते हैं. आश्वासन समाचार एजेंसियों के अनुसार भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को आश्लासन दिया है कि 296 पेट्रोलियम पदार्थों की डीलरशिप रद्द करने के बाद उन क्षेत्रों में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. सरकार ने आश्वासन दिया है कि उन क्षेत्रों में वैकल्पिक स्रोतों से पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है. सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोलियम मंत्रालय से पूछा था कि डीलरशिप रद्द करने का क्या असर पड़ेगा. दूसरी ओर डीलरशिप रद्द करने के ख़िलाफ़ शिकायत करने वाले अदालत ने मंगलवार को कहा है कि वह सबकी शिकायतें अलग अलग नहीं सुन सकता और सभी को मिलकर अपनी बात एक साथ अदालत के सामने रखना चाहिए. |
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