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'कई पेट्रोल पंपों का आबंटन रद्द होगा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पेट्रोल पंप आबंटन घोटाले की जाँच कर रही समिति ने 409 आबंटनों की जाँच करने के बाद 297 आबंटन रद्द करने की सिफ़ारिश की है. आबंटन को लेकर सरकार पर आरोप लगाए गए थे कि 2000-2002 के बीच आबंटित पेट्रोल पंप और मिट्टीतेल की एजेंसियाँ नियमानुसार वितरित करने के बजाय भारतीय जनता पार्टी से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं के रिश्तेदारों को आबंटित कर दिए गए. विपक्षी दलों ने इसे घोटाले का नाम दिया था. 2002 में जब यह मामला सामने आया था तब तत्कालीन एनडीए सरकार ने 3158 पेट्रोल पंपों का आबंटन रद्द कर दिया था. लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के इस फैसले को रद्द करते हुए इस मामले की जाँच करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश एससी अग्रवाल और उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश पीके बाहरी की एक समिति बनाकर इस मामले की जाँच करने के लिए कहा था. इस समिति ने पेट्रोल पंप आबंटन के 409 मामलों को संदेहास्पद माना और इसकी जाँच की. न्यायमूर्ति वाय के सबरवाल और न्यायमूर्ति डीएम धर्माधिकारी के समक्ष पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि समिति ने 297 मामलों में अनियमितता पाई है. सर्वोच्च न्यायालय के पीठ ने आबंटन रद्द करने के फ़ैसले से प्रभावित होने वाले लोगों के वकीलों को रिपोर्ट की प्रति देते हुए कहा कि कम से कम 73 प्रतिशत आबंटनों में अनियमितता पाई गई. न्यायालय ने कहा है कि वह अब उन सवालों पर विचार नहीं करेगा जिस पर जाँच समिति पहले से ही विस्तार पूर्वक विचार कर चुकी है. इसका मतलब यह है कि 297 आबंटन रद्द करने के मामले में अब न्यायालय कोई दखल नहीं देगा. हालांकि न्यायालय ने कहा है कि वह नियम और प्रक्रिया के उल्लंघन के किसी भी मामले की वह सुनवाई करेगा. |
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