|
श्रीलंका सरकार और एलटीटीई में ठनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में इस बात पर विवाद खड़ा हो गया है कि क्या सरकार ने तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई के नियंत्रण वाले इलाक़े में भरपूर सहायता सामग्री पहुँचाई जा रही या नहीं. एलटीटीई का आरोप है कि सरकार की तरफ से उन्हें बहुत कम सहायता मिल पाई है लेकिन सरकार का कहना है कि देश के दक्षिणी इलाक़े की तुलना में ज़्यादा सहायता तमिल बहुल पश्चिमोत्तर इलाक़े में दी गई है. किलिनोची से बीबीसी संवाददाता फ़्रांसिस हैरिसन का कहना है कि पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि सूनामी से हुई तबाही के कारण जातीय मतभेदों को सुलझाने में मदद मिलेगी लेकिन मतभेद घटने की बजाय बढ़ते ही नज़र आ रहे हैं. तबाही के बाद राहत कार्यों को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद उभर आए हैं और दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. एलटीटीई का आरोप है कि उनके नियंत्रण वाले इलाक़े में आने वाली सहायता सामग्री दूसरे इलाक़ों में भेजी जा रही है जबकि श्रीलंका सेना का कहना है कि एलटीटीई ने एक राहत और कल्याण शिविर को जला दिया. आरोप-प्रत्यारोप लेकिन एलटीटीई का कहना है कि श्रीलंका की सेना ने ऐसा किया. कल्याण शिविर का दौरा करने पर वहाँ के लोगों ने बताया कि इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि यह तो सिर्फ़ दो गाँवों के बीच लड़ाई का मामला है.
लेकिन इससे यह भी संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष किसी भी स्थिति का किस तरह लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. एलटीटीई इस बात से नाराज़ है कि राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने राहत और कल्याण शिविरों में सैनिकों को तैनात करने का आदेश दिया है. पूर्वी ज़िले त्रिंकोमाली के एक कैंप से आने वाली रिपोर्टों में कहा गया है कि वहाँ मौजूद सैनिकों के कारण तनाव है. जब हमने जाफ़ना प्रायद्वीप के एक कैंप का दौरा किया तो वहाँ सैनिक नहीं थे और स्थानीय लोगों ने सेना के कामकाज की सराहना की. एलटीटीई के एक अधिकारी ने चेतावनी दी है कि अगर इन शिविरों में सैनिक स्थायी रूप से तैनात रहेंगे तो समस्या खड़ी हो सकती है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||