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बुधवार, 15 दिसंबर, 2004 को 17:54 GMT तक के समाचार
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सेना में बदलते सामाजिक समीकरण

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निम्नमध्यवर्ग और खेतिहर पृष्ठभूमि के युवाओं में सेना का आकर्षण बढा है
लगभग एक दशक से भारतीय थलसेना को अफसर नहीं मिल पा रहे हैं क्योंकि अफ़सर बनने की योग्यता रखने वाले बहुत से लोग ऊँची आय वाले आईटी और प्रबंधन की ओर जा रहे हैं.

दूसरी ओर हाल के वर्षों में निम्नमध्यवर्ग और खेतिहर पृष्ठभूमि के युवाओं में सेना का आकर्षण बढा है.

सेना के अधिकारी मानते हैं कि सेना में यह बदलाव आ रहा है.

पिछले सप्ताह देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी की दीक्षांत परेड के बाद जो 440 कैडेट्स सेना में बतौर लेफ्टिनेंट शामिल हुए उनमें कई ऐसे उदाहरण देखने को मिले.

महाराष्ट्र के जलगांव के छोटे किसान परिवार से आने वाले लेफ्टिनेंट अरूण पाटिल ने कहा कि उन्होंने सेना को अपना करियर इसलिए बनाया कि यहां तत्काल रोज़गार मिलता है और अब यही ऐसा प्रोफेशन रह गया है जिसमें सम्मान बना हुआ है.

 अब भी जब गांव में सेना का कोई अफसर पहुंचता है तो लोग उसे बहुत आदर और सम्मान देते हैं और एक उम्मीद से देखते हैं
अरूण पाटिल, नए अफ़सर

पाटिल कहते हैं, “अब भी जब गांव में सेना का कोई अफसर पहुंचता है तो लोग उसे बहुत आदर और सम्मान देते हैं और एक उम्मीद से देखते हैं.”

ऐसा सोचने वाले अरूण पाटिल अकेले नहीं हैं. राजस्थान के झुंझनु के रहने वाले विकास झाझरिया की राय में भी उनके जैसे पिछड़े इलाकों के लिए रोज़गार का एकमात्र और सुनिश्चित ज़रिया सेना ही है.

वे कहते हैं, “मेरे गांव में हर दूसरे परिवार का लड़का सेना में है. हालांकि इनमें से ज़्यादातर रैंक और फाइल्स में ही है. मैंने सोच रखा था कि सेना में जाउंगा तो अफसर बनकर ही. सेना के अफसरों की लाइफ स्टाइल ही अलग होती है.”

विकास के पिता खुद सेना में जवान रह चुके हैं.

रोज़गार की संभावनाओं, सामाजिक पायदान पर ऊपर उठने की प्रतिस्पर्द्धा, अफसरी से जुड़े ठाठबाट के रूमान और वर्दी की आनबान और शान की वजह से निम्नमध्यमवर्ग के युवाओं में सेना के प्रति और उससे भी बढ़कर सैन्य अफसर बनने की चाह बढ़ी है.

कमी

रिटायर्ड मेजर प्रेमराम डंगवाल कहते हैं, “सेना की सामाजिक संरचना में अब बदलाव आ रहा है. किसान पृष्ठभूमि और पिछड़े इलाकों के काफी ज़्यादा लड़के सेलेक्ट होकर एनडीए और सीडीएस जैसी प्रतियोगिताओं में निकल रहे हैं.”

इस बार सेना में शामिल हुए इन नये अफसरों में एक ट्रेन ड्राइवर के बेटे नलिन द्विवेदी भी हैं.

नलिन के पिता बेबाकी से कहते हैं,” लोग सोचते हैं बेटा सरकारी नौकरी करेगा तो तीन के तीस कर पाएगा.सेना मे तो इसकी गुंजाइश है नहीं इसलिये लोग आना नहीं चाहते.”

इस समय भारतीय सेना में करीब 14 सौ अफसरों की कमी बतायी जाती है.

 जैसा कि आप जानते हैं सेना अफसरों की कमी का सामना कर रही है. सेना महज़ पेशा भर नहीं है. हमें प्रतिबद्ध लोगों की तलाश है. लेकिन जिस स्तर के लोग हमें चाहिए वैसे लोग दूसरे पेशे की ओर रूख कर रहे हैं
अशोक पिल्लै, सैन्य प्रशिक्षक

सैन्य अधिकारियों और प्रशिक्षकों की राय है कि ये कमी आवेदकों की संख्या में कमी की वजह से नही है बल्कि योग्य आवेदकों की कमी की वजह से है.

आईएमए में प्रशिक्षक ब्रिगेडियर अशोक पिल्लै कहते हैं, “जैसा कि आप जानते हैं सेना अफसरों की कमी का सामना कर रही है. सेना महज़ पेशा भर नहीं है. हमें प्रतिबद्ध लोगों की तलाश है. लेकिन जिस स्तर के लोग हमें चाहिए वैसे लोग दूसरे पेशे की ओर रूख कर रहे हैं.”

सेना के अधिकारिया का कहना है कि अफसरों की इस कमी को पूरा करने के लिए चयन के मानकों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता.

ऐसे हालात में कस्बों और गांवों के लोगों में दिख रहे नये रुझान से सैनिक अकादमी में उत्साह तो है लेकिन नाम न लेने की शर्त पर एक सैनिक अधिकारी कहते हैं कि अगर सेना में भी वेतन और सुविधाएं बढ़ दी जाएं तो कोई कारण नहीं कि वो अच्छी प्रतिभाएं यहां नहीं आएँ जो दूसरे पेशों की ओर रूख कर रहे हैं.

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