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बुधवार, 01 दिसंबर, 2004 को 12:53 GMT तक के समाचार
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बदहवास भीड़ और पुलिस की ड्यूटी

स्वराज पुरी
स्वराज पुरी अब उन घटनाओं को याद भी नहीं करना चाहते
स्वराज पुरी, दिसंबर,1984 की उस रात भोपाल के पुलिस अधीक्षक थे.

ज़ाहिर है कि गैस रिसने की ख़बर के बाद उन्हें शहर में अपनी ड्यूटी करनी पड़ी. और नतीजा यह हुआ कि ज़हरीली गैस से आँखें खराब हो गईं और फेफड़ों की क्षमता 25 प्रतिशत कम हो गई.

उस रात की कहानी, स्वराज पुरी की ज़ुबानी

मुझे याद है कि दो दिसंबर की रात 11 बजे मैं अपने घर पहुँचा और सोने की तैयारी कर रहा था. करीब 12 बजे बाहर एक गाड़ी आई.

सब- इंस्पेक्टर चाहतराम ने बाहर से चिल्लाकर कहा, "सर, यूनियन कार्बाइड की टंकी फूट गई है. शहर में भगदड़ मच गई है."

मैंने टेलीफोन उठाया लेकिन टेलीफोन काम नहीं कर रहा था. इतने में टीआई सुरेन्द्र सिंह भी आ गए और उन्होंने बताया कि शहर में गदर मच रहा है.

मैंने एक जैकेट पहनी और यूनियन कार्बाइड की ओर गाड़ी दौड़ा दी. मुझे याद आता है, सामने से रजाई-कंबल ओढ़े लोग, खाँसते हुए भाग रहे थे. मैंने महसूस किया कि मैं भी खाँस रहा हूँ.

यूनियन कार्बाइड के गेट पर एक काला-सा आदमी था और ऊपर आकाश में गैस जैसा कुछ दिखने लगा था. उस काले आदमी ने कहा, "सर, सभी लोग टंकी के पास गए हैं."

 मैं कारख़ाने से निकलकर सामने की बस्ती, जेपी नगर गया, बाईं तरफ के भी टोला था. सब ओर भगदड़ मच गई थी. मेरी आँखों में जलन हो रही थी और गला बंद हो गया

मैं कारख़ाने के सुरक्षा कार्यालय में गया पर वहाँ कोई नहीं था और तब तक गैस का असर भी बढ़ गया था.

मैं कारख़ाने से निकलकर सामने की बस्ती, जेपी नगर गया, बाईं तरफ के भी टोला था. सब ओर भगदड़ मच गई थी. मेरी आँखों में जलन हो रही थी और गला बंद हो गया.

हम लोगों ने कलेक्टर को ढूंढ़ना शुरु किया. कंट्रोल रूम पहुँचा, वहाँ चौहान थे. कंट्रोल रूम शहर के बीच में था.

युवती और बच्चा

भोपाल में वेपर लैंप लग गए थे. मैं कंट्रोल रूम के बाहर भागती भीड़ को रोकने लगा.

लाशें
ऐसी कितनी ही भयावह तस्वीरें स्वराज पुरी के ज़हन में हैं

तभी मेरी निगाह एक युवती पर पड़ी जो रात के कपड़ों में थी. उसके हाथ में बच्चा था. मैं भीड़ के धक्के में दौड़ा ताकि बच्चे को बचा सकूँ पर भीड़ का रेला ऐसा था कि युवती के हाथ से बच्चा फिसल गया. सुबह छह बजे मैंने उस बच्चे की लाश सड़क पर पड़ी देखी. इस दुर्घटना को मैं कभी नहीं भूल सकता.

सुबह साढ़े छह बजे कमिश्नर रंजीत सिंह का फोन आया कि रेलवे स्टेशन पर हालात ख़राब हैं.

रेलवे स्टेशन के सामने एक गोल चक्कर बना था. पुलिस ऑफसर एसएस बिल्ला को देख मैं चिल्लाया कि ये लोग क्यों सो रहे हैं, इन्हें उठाओं. यह कहते हुए उन सारे लोगों के हाथों को मैं खींचने लगा. बिल्ला ने कहा, "सर ये लाशें हैं. 36 हैं. हमदिया पहुँचा रहा हूँ."

मुख्यमंत्री मीटिंग

सुबह मुख्यमंत्री के यहाँ एक मिटिंग हुई.

अफ़वाह उड़ी थी कि एक टंकी और फूट गई है. फिर क्या था, लोग फिर भागने लगे.

नीचे पोलिटेक्निक आया तो भीड़ पुराने भोपाल से नए भोपाल की ओर जा रही थी. मैं ट्रैफिक आईलेंड पर चढ़ गया और माइक पर मैंने लोगों से कहा कि वे घर लौट जाएँ और भीड़ को पुराने भोपाल जाने के लिए मैं ख़ुद उनके साथ चलने लगा.

पैदल कमला पार्क पार किया.

ऐसी अनेकों घटनाएँ है जो उस रात बीतीं जब मन में असहायता का बोझ महसूस किया. उस रात और अगले कुछ दिन ऐसे-ऐसे मंजर देखे-महसूस किए जो अब याद नहीं करूँ तो अच्छा है.

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