|
पेट्रोल-डीज़ल क़ीमतें फ़िलहाल नहीं बढ़ेंगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने फ़िलहाल पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी का फ़ैसला टाल दिया है. पेट्रोल और डीजल की क़ीमतें बढ़ाने पर रविवार को फ़ैसला होना था लेकिन सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली वामपंथी पार्टियों की सलाह के बाद इस पर फ़ैसला टल गया है. वामपंथी पार्टियों ने सरकार से कहा कि वे चार नवंबर तक इंतज़ार करें ताकि अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव ख़त्म हो जाए. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी ने पत्रकारों को बताया कि इस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की क़ीमतों में जो बढ़ोत्तरी हुई है वह अस्थिर राजनीति के कारण हुई है. स्थिर उन्होंने कहा कि अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे के बाद तेल की क़ीमते शायद स्थिर हो जाएँगी. इस बार वामपंथी दलों ने तेल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी को लेकर सरकार पर उतना दबाव नहीं बनाया था जैसा कि उन्होंने पिछली बार किया था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की क़ीमतों में उछाल के कारण पिछले कई दिनों से भारत में भी पेट्रोल और डीजल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी के लिए सरकार पर दबाव बढ़ गया था. भारत में तेल कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की क़ीमतों के आधार पर देश में पेट्रोलियम पदार्थों की क़ीमतों की हर 15 दिनों में समीक्षा कर सकतीं हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत बढ़कर 56 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई. 1980 के दशक के बाद पहली बार तेल की क़ीमत इस स्तर पर गई है. भारत अपनी ज़रूरत के 70 फ़ीसदी कच्चे तेल का आयात करता है जिसके लिए वह मध्य पूर्व के देशों पर निर्भर करता है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||