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गुजरात में स्कूली किताबों पर विवाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शिक्षा के भगवाकरण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे विवाद में गुजरात से एक नई कड़ी जुड़ गई है. कुछ रोज़ पहले कुछ शिक्षाविदों और गैर-सरकारी संगठनों ने गुजरात में आठवीं कक्षा में पढ़ाई जा रही सामाजिक विज्ञान की पुस्तक को पाठ्यक्रम से हटाने और दसवीं कक्षा में हिटलर की तारीफ़ में लिखे गए अंशों को हटाने की माँग की है. उनका कहना है कि पुस्तकों में न केवल व्याकरण और भाषा की दृष्टि से ग़लती है, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों को भी तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है. तथ्यों पर विवाद किताब में एक जगह लिखा हुआ है, “जर्मनी में नौजवानों को फ़ौजी प्रशिक्षण देने के लिए एक कैंप खोला गया था जहाँ इनको बम बनाने-चलाने तथा उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण दिया जाता था.” प्रशांत नाम की संस्था के फ़ादर कैड्रिक प्रकाश कहते हैं, “इस वाक्य से भारत की आज़ादी के लिए अहिंसा की लड़ाई का महत्व कम हो जाता है.” “इसमें यह नहीं लिखा गया कि भारतीयों के एक छोटे से गुट को नाज़ी जर्मनी में प्रशिक्षण दिया गया था. इस वाक्य से हिंसा और हिंसक कार्रवाई को ठीक ठहराया गया है.” इसी तरह जहाँ किताब के आवरण पर बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीर हैं, वहीं महात्मा गाँधी और पंडित नेहरू की तस्वीरें ग़ायब हैं. पुस्तक में सुभाष चंद्र बोस के बारे में लिखे गए हिस्से को लेकर भी विवाद है. इसमें कहा गया है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 'फ़ॉरवर्ड ब्लॉक' ने युद्ध विरोधी प्रचार किया था. पुस्तक के अनुसार बोस ने इस दौरान 10 महीनों तक देश भर को दौरा किया था और वीर सावरकर सहित कई क्रांतिकारियों से मुलाकात की थी. फ़ादर प्रकाश कहते हैं कि पुस्तक में औरंगज़ेब का भी एकतरफ़ा चित्र प्रस्तुत किया गया है जबकि शिवाजी को पूर्ण नायक के रूप में दिखाया गया है. इसी प्रकार और भी कई ऐसी गलतियाँ हैं जो कि इतिहास की दृष्टि से सच नहीं हैं. वापस नहीं होंगी पुस्तकें शिक्षाविद फ़ादर फ्रांसिस परमार बताते हैं कि इस पुस्तक में आतंकवाद के उदाहरण के रूप में रियाद, जम्मू-कश्मीर और अक्षरधाम में हुए आतंकवादी हमलों का तो ज़िक्र है पर बाबरी मस्जिद ध्वंस और गोधरा के बाद गुजरात में हुए दंगों का ज़िक्र नहीं किया गया है. इस बारे में पूछे जाने पर गुजरात के शिक्षामंत्री आनंदीबेन पटेल कहते हैं, अगले संस्करण में इन गलतियों को सुधार लिया जाएगा. जारी पाठ्यक्रम से पुस्तक को वापस नहीं लिया जा सकता. सरकार पर यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि जहाँ आठवीं कक्षा में भारत छोड़ो आंदोलन के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू पढ़ाए जा रहे हैं, वहीं कक्षा 10 में हिटलर की गौरवपूर्ण छवि प्रस्तुत की गई है. इसमें हिटलर की महानता का बखान किया गया है और नाज़ियों की जर्मनी की उपलब्धियों का ज़िक्र किया गया है. गुजरात सरकार का कहना है कि जिस सामग्री पर आपत्ति जताई जा रही है वो कांग्रेस सरकार के दौरान पाठ्यक्रम में शामिल की गई थी. चिंतित अभिभावक पुस्तक के स्तर को लेकर बच्चों के अभिभावक भी ख़ासे चिंतित हैं. एक ऐसी ही अभिभावक डॉ. कामिनी कामदार कहती हैं, "पुस्तक में अगर भाषा की गलतियाँ हों तो बच्चे शुरू से ही ग़लत सीखते हैं. ऊपर से अगर तथ्यों को भी ग़लत तरीक़े से बताया जाएगा तो हम इन पुस्तकों पर कैसे विश्वास करेंगे?" वो आगेबच्चों को कहती हैं, "अगर हम घर पर ही सब कुछ बता सकते तो उन्हें स्कूल भी भेजने की क्या ज़रूरत थी. अब अगर यहाँ भी गलत जानकारी दी जा रही है तो यह वाकई दुखद है." हालांकि विवाद से अभी प्रदेश का आम जनमानस दूर ही है पर राजनीतिक दल इसे बड़ा मुद्दा बनाने में लगे हुए हैं. |
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