| सरकार उग्रवादियों से वार्ता को तैयार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
असम और नगालैंड में चरमपंथी हिंसा के बाद भारत सरकार ने कहा है कि वो उल्फ़ा समेत इलाक़े में सक्रिय तमाम उग्रवादी गुटों से बातचीत को तैयार है, बशर्ते वो हिंसा छोड़ दें. शनिवार को नगालैंड में हुए बम विस्फोट में 36 लोगों की जान गयी है, जबकि असम में लगातार दूसरे दिन भी हिंसक घटनाएँ हुई हैं. दोनों राज्यों में पिछले दो दिनों में अलगाववादी हिंसा में कम से कम 67 लोग मारे गए हैं. पिछले दिनों असम सरकार ने उल्फा के समक्ष बातचीत का प्रस्ताव रखा था जिसे उल्फ़ा ने खारिज कर दिया. उल्फा के प्रमुख परेश बरुआ ने बीबीसी से कहा, “ हम राज्य सरकार से बात नहीं करेंगे. अगर केंद्र सरकार बातचीत करे तो हम तैयार है.” इस बारे में जब बीबीसी ने गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से संपर्क किया तो उन्होंने कहा,“अगर उल्फ़ा ने ऐसा कोई प्रस्ताव दिया है तो हम बात करने को तैयार है. इसके लिए राज्य सरकार के साथ संपर्क करना होगा और सब कुछ तय करना होगा.” हिंसा का नया दौर जानकारों का मानना है कि पूर्वोत्तर में अचानक लगने वाला हिंसा का दौर कई कारणों से शुरु हुआ है. पूर्वोत्तर राज्यों में कई साल काम कर चुके पूर्व गृह सचिव बीपी सिंह कहते हैं, “ तीन कारण हैं. भारत सरकार की भूटान में उल्फ़ा के खिलाफ की गयी कार्रवाई, अलगाववादी गुट एनएससीएन(आईएम) के बिना परिणामों के चली लंबी वार्ता और मणिपुर में सशस्त्र सेना के खिलाफ़ नाराज़गी.”
कारण चाहे जो भी हों पूर्वोत्तर फिर से सुलगने लगा है और भारत सरकार के पास कोई खास योजना नहीं दिखती. चरमपंथी हिंसा के बाद गृह मंत्रि शिवराज पाटिल असम पहुंचे और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से बातचीत के बाद कहा कि बर्मा और बांग्लादेश में भारत विरोधी चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करेगी. तो क्या गृह मंत्री की कार्रवाई और बातचीत एक साथ चलेगी, गृह राज्य मंत्री जायसवाल कहते हैं, “हमारा कहना है कि अगर चरमपंथी हिंसक कार्रवाई जारी रखेंगे तो वार्ता मुश्किल होगी. उन्हें हिंसा बंद करनी होगी.” भारत की आजादी के बाद से ही पूर्वोत्तर हमेशा पूरे देश के कटा रहा है. पिछले कुछ वर्षों में सात बहनों के नाम से जाने जाने वाले इन राज्यों को मुख्यधारा से जोड़ने की पुरजोर कोशिश हुई. उत्तर पूर्व मामलों का विभाग भी बनाया गया. लेकिन ताज़ा हिंसा और पिछले दो सालों में इन राज्यों की घटनाओं से लगता नहीं कि सरकारी रवैये से इन राज्यों को कोई खास भला हो सका है. |
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