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पोटा हटाने वाले अध्यादेश को मंज़ूरी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने आतंकवाद निरोधक क़ानून पोटा को निरस्त करने के लिए लाए जाने वाले एक अध्यादेश को मंज़ूरी दे दी है. शुक्रवार को दिल्ली में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में ये फ़ैसला किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की. कैबिनेट के फ़ैसले की जानकारी केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री एस जयपाल रेड्डी और गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने दी. उन्होंने साथ ही कहा कि सरकार ने ये भी तय किया है कि आतंकवाद की रोकथाम के लिए सरकार मौजूदा क़ानूनों को ही प्रभावी बनाने के बारे में विचार करेगी. पोटा की अवधि एक महीने बाद ख़ुद समाप्त हो रही है. कारण गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा कि पोटा कई कारणों से बेहद कड़ा क़ानून बन गया था और उसे हटाना ज़रूरी हो गया.
उन्होंने कहा कि इस क़ानून की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि ख़ुद को निर्दोष साबित करने की ज़िम्मेदारी अभियुक्त पर ही डाल दी गई जबकि ये अभियोग पक्ष की ज़िम्मेदारी होती है कि वह अभियुक्त पर दोष साबित करे. उन्होंने कहा, "इस क़ानून को हटाने का फ़ैसला इसलिए किया गया है ताकि निर्दोष लोगों को परेशानी से बचाया जा सके." पोटा को हटाने के लिए लाए जानेवाले अध्यादेश के मसौदे को विधि मंत्रालय ने पहले ही मंज़ूरी दे दी थी. केंद्र में सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन या यूपीए के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में पोटा को हटाना शामिल था. विवादास्पद क़ानून पोटा क़ानून पिछली एनडीए सरकार ने विपक्षी दलों के विरोध के बीच 2001 में बनाया था. मगर विधेयक बनने से लेकर क़ानून बनने तक पोटा को लेकर विवाद बना रहा. लोकसभा में सरकार ने बहुमत के आधार पर विधेयक को पारित करवा लिया था. लेकिन राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से सरकार को संयुक्त अधिवेशन बुला कर इसे पारित करवाना पड़ा. इस बीच सरकार ने इसे अध्यादेश के रुप में लागू कर दिया था. अध्यादेश की जगह 28 मार्च 2002 को पोटा क़ानून लागू किया गया था. मगर मनमोहन सरकार में शामिल अधिकांश दलों ने विपक्ष में रहते हुए इस क़ानून का विरोध किया था. उनका कहना था कि इस क़ानून का दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहेगी. |
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