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मुशर्रफ़ की स्थिति पर संसद में बहस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नेशनल एसेंबली में गुरूवार को इस मुद्दे पर बहस हुई कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ एक साथ राष्ट्रपति और सेना प्रमुख के पद पर बने रह सकते हैं या नहीं. पाकिस्तान में सरकार के समर्थन से एक अभियान चलाया जा रहा है कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ इस साल 31 दिसंबर के बाद भी सेनाध्यक्ष के पद पर बने रहें. विपक्ष ने सरकार के समर्थन से चल रहे इस अभियान पर गुरूवार को संसद से वॉकआउट किया. कुछ विपक्षी सदस्यों ने सूचना मंत्री शेख़ रशीद अहमद के उस बयान की निंदा की जिसमें उन्होंने उम्मीद जताई थी कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ अपनी सैनिक वर्दी को नहीं छोड़ेंगे. बुधवार को इस बारे में भ्रम फैला जब पाकिस्तान के सूचना मंत्री राशिद अहमद ने पहले ये कहा कि मुशर्रफ़ अपने वादे के अनुरूप सेना प्रमुख का पद नहीं छोड़ेंगे, और इसके थोड़ी देर बाद वे अपने बयान से पलट गए थे.. राशिद अहमद ने अपने बयान के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए ये कहा कि उनका कहने का मतलब ये था कि परवेज़ मुशर्रफ़ सेना का नेतृत्व करते रहेंगे. विपक्ष नाराज़ गुरूवार को लगभग सभी विपक्षी सदस्यों ने इस मामले को देश की संवैधानिक व्यवस्था और लोकतंत्र की बेइज़्ज़ती बताया. हालाँकि नेशनल एसेंबली के अध्यक्ष ने इस मुद्दे पर गुरूवार को बहस की इजाज़त नहीं दी और कहा कि वे अपना फ़ैसला बाद में देंगे.
प्रधानमंत्री शौक़त अज़ीज़ ने पत्रकारों से कहा था कि वे चाहते हैं कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ सेना प्रमुख के पद पर बने रहेंगे तो यह देश हित में रहेगा. परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा था कि वे अगले वर्ष जनवरी तक सेना प्रमुख का पद छोड़ देंगे. वैसे इस बारे में बहस अक्तूबर 2002 से ही चल रही है जब पाकिस्तान में आम चुनाव हुए थे. मगर सोमवार को ये बहस और गर्म हुई जब पंजाब प्रांत की विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर मुशर्रफ़ से ये आग्रह किया गया कि वे आतंकवाद का सामना करने के लिए और आर्थिक स्थिरता के लिए दोनों ही पदों पर बने रहें. इसके जवाब में पाकिस्तान की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों ने बुधवार को उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत की विधानसभा में एक अलग प्रस्ताव लाया जिसमें मुशर्रफ़ से कहा गया है कि वे किसी एक पद पर बने रहने के अपने वादे से ना मुकरें. विश्लेषकों का मत है कि अगर मुशर्रफ़ अपने वादे को पूरा नहीं करते हैं तो इससे पाकिस्तान की कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों में नाराज़गी फैलेगी. परवेज़ मुशर्रफ़ ने आम चुनाव के ठीक बाद विपक्षी दलों के विरोध के बाद पाकिस्तान की छह इस्लामी पार्टियों से ये वादा किया था कि वे 31 दिसंबर 2004 तक सेना प्रमुख का पद छोड़ देंगे. |
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