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धीरे-धीरे चलेगी शांति वार्ता की गाड़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दोनों ही पक्ष ये जानते हैं कि कश्मीर समस्या के हल की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाएगी, लेकिन इस वक्त इस मुद्दे पर दोनों ही पक्ष चिंतित नहीं हैं. उनकी असली चिंता इस वक्त यह है कि इसी वर्ष जनवरी में शुरू की गई उस शांति वार्ता में किस तरह से जान फूँकी जाए जो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बीच शुरू हुई थी. हालाँकि तब भी दोनों देशों के राजनयिक और विश्लेषक ये समझ रहे थे कि शांति का रास्ता बहुत लंबा और थकाऊ होगा, ख़ास तौर पर इस कश्मीर विवाद का तो कोई शीघ्र समाधान नहीं निकल सकता. लेकिन जनवरी में इस्लामाबाद से जारी किए भारत-पाकिस्तान के साझा बयान के बारे में कूटनीति के जानकारों की भी यही राय थी कि पाकिस्तान की ओर से ये शांति की एक ईमानदार कोशिश है. जनवरी से लेकर अब तक काफी कुछ बदल गया है. भारत में सरकार बदल गई और शांति प्रक्रिया का सबसे अहम किरदार पूर्व प्रधनमंत्री वाजपेयी मंच से गायब हो गए, जिन्हें पकिस्तान में भी इस शांति प्रक्रिया का सूत्रधार माना जाता रहा है.
वाजपेयी शायद अकेले ऐसे नेता रहे जिन्हें इस शांति प्रक्रिया के संदर्भ में दोनों ही पक्षों की ओर से भरपूर विश्वास मिला. भारत की यूपीए सरकार के सामने बड़ी चुनौती होगी, शक-शुबहे के ख़्यालों वाले उन पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञों को शांति वार्ता में भरोसा दिलाना, जो ये सोचते हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार शायद स्थायी शांति के प्रति उतनी उत्सुक नहीं है या फिर कश्मीर के मुद्दे पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं होगी. इसी दौरान भारत ने भी अपनी ओर से शंकाएँ जताईं जैसे कि भारतीय कश्मीर में हिंसा की वारदातों में बढ़ोतरी हुई. भारत का आरोप है कि पाकिस्तान अपने उस वादे से मुकर गया है जिसमें उसने ये कहा था कि चरमपंथी गतिविधियों वह अपने क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं होने देगा. आरोप प्रत्यारोप भारत कहता है कि पाकिस्तान चरमपंथ को रोकने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठा रहा है जबकि पाकिस्तान कहता है कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए भारत ईमानदार कोशिश नहीं कर रहा है.
सीमा पार से घुसपैठ बढ़ने के भारत के ताज़ा दावे के बाद दोनों पक्षों के बीच शुरू हुई असहजता को देखते हुए कई विश्लेषक शांति प्रक्रिया के भविष्य को लेकर आशंकित दिखने लगे हैं. दोनों पक्षों ने शायद समझ लिया है कि वार्ताओं के बारे में लोगों की उम्मीदें बढ़ाना ही काफ़ी नहीं है उसके बाद कुछ हासिल भी करना होता है, यही वजह है कि दोनों पक्ष प्रयास कर रहे हैं कि वे लंबी-चौड़ी बातें करने से बचें. इस वर्ष मई में भारत में सत्ता परिवर्तन के बाद से दोनों पक्षों के बीच कई बार बातचीत हुई है, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच अब तक तीन मुलाक़ातें हो चुकी हैं. दोनों तरफ़ से मतभेदों को कम करने की कोशिशें तो हुई हैं लेकिन अब तक कोई ठोस घोषणा नहीं हो सकी है, जिन मुद्दों पर मतभेद नहीं हैं उन पर कोई ठोस काम नहीं हो सका है, मिसाल के तौर पर कराची और मुंबई में वाणिज्य दूतावास शुरू करना. प्रक्रिया भारत चाहता है कि पाकिस्तान के साथ उसी तरह से बातचीत हो जैसे चीन के साथ होती है यानी सीमा विवाद सहित सभी मुद्दों पर एक साथ बातचीत.
इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने 72 प्रस्तावों की एक सूची पाकिस्तान को दी है जिसमें लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने, व्यापार को बढ़ावा देने जैसी बातें शामिल हैं, इनमें से कुछ पर अमल भी हो रहा है. लेकिन समस्या ये है कि भारत के इस पसंदीदा तरीक़े को पाकिस्तान में हाथोहाथ लेने वाले लोग कम हैं, राष्ट्रपति मुशर्रफ़ कह चुके हैं कि जब कश्मीर मसले पर प्रगति नहीं होती व्यापार जैसे मामलों पर बात आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं की जा सकती. सतर्कता इसके अलावा दोनों में से कोई भी देश पहले ऐसी कोई बात नहीं मानना चाहता जो देश के भीतर लोगों को पसंद न आए, या फिर आगे की बातचीत में कोई पक्ष उसका फ़ायदा उठाने की स्थिति में आ जाए.
यही वजह है कि दोनों देशों के बीच जनता की आवाजाही जैसे मुद्दे भी संशय का शिकार बन जाते हैं, मिसाल के तौर पर श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद के बाद प्रस्तावित बस सेवा को लेकर दिल्ली और इस्लामाबाद इस बात पर सहमत नहीं हो पा रहे हैं कि यात्रियों से संबंधित काग़ज़ी कार्रवाई कैसे की जाए. पाकिस्तान का मानना है कि अगर कश्मीरी जनता भारतीय पासपोर्ट पर यात्रा करेगी तो इससे यह समझा जाएगा कि वे भारत के ही नागरिक हैं इसलिए उसका कहना है कि लोगों को यात्रा के लिए परमिट जारी किए जाएँ. भारत का कहना है कि अगर ऐसा ही है तो इसी तरह के परमिट राजस्थान और पंजाब की सीमा पार करने के लिए भी दिए जाएँ. ऐसी परिस्थितियों में तय है कि भारत-पाकिस्तान बातचीत का आधार व्यावहारिक चर्चा ही हो सकती है न कि प्रचार. बातचीत कैसी होगी इसका अंदाज़ा नटवर सिंह के बयान से हो जाता है जिसमें उन्होंने कहा है, "न तो कोई नाटकीय सफलता होगी न ही नाटकीय नाकामी." |
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